लेख: बिजेंद्र सिन्हा दुर्ग
राम राज्य की चर्चा इन दिनों जोरों पर है परन्तु राम राज्य से पहले प्रेम राज्य होना चाहिए। विद्वानों का मत है कि राम राज्य की स्थापना उसी दिन हो गयी थी जिस दिन श्री राम राजसत्ता वैभव समस्त साधनों सुविधाओं को त्यागकर पथरीली व कंटीली राहों से वन की ओर प्रस्थान करते हैं। स्पष्ट है कि श्री राम जी का राज्य प्रेम त्याग एवं समर्पण पर आधारित था। मौजूदा परिवेश में निरंतर नैतिक मूल्यों की अवहेलना हो रही है। विभिन्न भ्रान्तियाँ वैचारिक कलुषता वैमनस्यता तेजी से बढ़ रहे हैं। इंसानी जिन्दगी एवं समाजिक परिवेश में कटुता एकता में संकट पैदा कर रहा है। आज वर्तमान में यही स्थिति है। अतः राम राज्य जैसी व्यवस्था मौजूदा दौर में अपेक्षित है।
वास्तव में सभी धर्म सत्य अहिंसा प्रेम त्याग न्याय भाईचारा व शांति की शिक्षा देते हैं। सहिष्णुता व सौहार्द्रता जड़ है सामाजिक जीवन की। जिसे नकार कर हम सुख समृद्धि शान्ति व विकास की कल्पना कैसे कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति भी उदारवादी है। यहाँ की संस्कृति अनेक जातियों के लोगों व अनेक प्रकार के विचारों के बीच संबंध स्थापित करता है। विविधताओं एवं भिन्नताओं के बीच एकता एवं सामंजस्य स्थापित करने की दृढ इच्छाशक्ति एवं साहस इसमें सदा से रहा है।
श्री राम चरित मानस में
श्री राम-भरत मिलाप का प्रस॔ग पारिवारिक सामाजिक व राष्ट्रीय जीवन में प्रेम एकता व भाईचारे का संदेश देता है।
श्री राम जी का समग्र व समावेशी व्यक्तित्व समाज में विषमता को मिटाकर एक सूत्र में बंधने एवं एकता समता व मिल जुलकर रहने की प्रेरणा देता है। सर्वोत्तम होगा कि वर्तमान समय में राम राज्य का स्वरूप ऐसा हो जिसमें नैतिकता पर आधारित एक ऐसा राज्य जिसमें धर्म जाति क्षेत्र लिंग व भाषा आदि के आधार पर भेदभाव न हो। भगवान श्री राम के सिद्धांतों कर्तव्यनिष्ठा निष्पक्षता एवं
न्याय पूर्ण तरीकों का अनुसरण कर राम राज्य लाया जा सकता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम प्रेम व समरसता के सन्देशवाहक एवं आध्यात्मिक चेतना के संवाहक हैं। उनका व्यक्तित्व विशाल महासागर की तरह है। जिनका हर रूप मानव जीवन के हर पहलू के लिए अनुकरणीय है। कर्तव्यनिष्ठा सदाचार दृढ़निष्ठा प्रेम त्याग सेवा एवं समर्पण आदि गुण उनके व्यक्तित्व का आधार था। आज के सूखती संवेदना व कमजोर पड़ रहे रिश्तों के दौर में श्री राम जी के पारिवारिक मूल्यों से परिपूर्ण व्यक्तित्व प्रासंगिक हैं। अगर हम राष्ट्रीय परिदृश्य में श्री राम के व्यक्तित्व को देखें तो वे महान लोकनायक थे। उन्होंने जन सामान्य व समाज के अन्तिम पंक्ति के अन्तिम व्यक्ति को भावनाओं को महत्व दिया। जन -जन की आवाज़ को ऊंचाई प्रदान किया। जनसेवा को अपनी जीवन साधना बना लिया।
यह भी सन्दर्भित है कि श्री राम को विजय के लिए कुछ विशेष नहीं करना पड़ता है। श्री राम पैदल हैं लेकिन विजय रथ उनके पास है। धर्म मर्यादा की अभिव्यक्ति ही उनका विजय रथ है। मर्यादा से ही विजय और कीर्ति प्रदान होती है। नीति और
मर्यादा के बिना समाज का व्यवस्था क्रम चलना असम्भव है। मर्यादा का उल्लंघन होते ही ध्वंस की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। आज संवेदनहीनता आक्रमकता दुष्कर्म दुरव्यसन व अपराधों का भयानक रूप पूरी समर्थता के सहारे दैत्यों दानवों की तरह बढ़ा है। कुचक्रों षडयंत्र छल प्रपंचों की करतूत दिनों दिन बढ़ती चली जा रही है ।हमारी जिंदगी एवं समाजिक परिवेश में इन अनैतिक तत्वों का संयोग व समावेश तीव्र नैतिक पतन पैदा कर रहा है।आज सर्वाधिक आवश्यकता इन दानव रूपी दूषित प्रवृत्तियों का महाविनाश कर इन दूषित प्रवृत्तियों से मुक्त होने की है। श्री राम के गुण व आचरण के अनुकूल मर्यादा रखने व उनके गुणों व आदर्शों को फैलाने की जरुरत है। उन्होंने जीव
जंतुओं सहित समाज के सभी वर्गों के लोगों का उत्थान किया। स्पष्ट है कि उनका समग्र व समावेशी व्यक्तित्व भेदभाव मिटाकर मिल जुलकर रहने की प्रेरणा देता है । राम राज्य की गरिमा को बनाये रखना हमारे सद्व्यवहार व सद्भावना पर निर्भर करता है
