DAILY BALOD NEWS

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सफल व्यक्ति जीवन में या तो जीतता है या सीखता है पर कभी हारता नहीं है -ऋषभसागरजी म सा

बालोद l सहजानंद चातुर्मास में प्रवचन श्रृंखला के दूसरे दिन महावीर भवन में विराजित परम पूज्य ऋषभ सागर जी ने लोगों को इस बात के लिए प्रेरित करते हुए जोर दिया कि आज से ही अपने आप को बदलने के बारे में सोचिए और उस कार्य में लग जाइए। उन्होंने कहा सब कुछ मिलने के बाद भी हमारे जीवन में जो प्रसन्नता और शांति होनी चाहिए वह दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। जीवन में छोटी-छोटी परिस्थितियों में भी हम हार जाते हैं। हम शरीर का पूरा पोषण करते हैं लेकिन आत्मा पर ध्यान नहीं देते। यह जीवन जड़ और चेतन, आत्मा और शरीर का संयोग है। शरीर दिखाई देता है इसलिए सब उसका ध्यान देते हैं पर आत्मा की उपेक्षा करते हैं। जिससे दुखी आत्मा शरीर पर प्रभाव छोड़ती है और बीमारी उत्पन्न होती है। इसलिए हमें आत्मा पर भी विचार करना चाहिए। हम कैसे सोचना है, ये नहीं सीख पाए। जैसे सोचेंगे वैसे जीते हैं। हम नहीं सीख पाए कि कैसे सोचना है तो फिर हमें वातावरण सीखाने लग जाता है और हम वातावरण के हिसाब से ढलने लगते हैं। और हमारी सोच वैसे ही बन जाती है। उसे बदलना फिर आसान नहीं होता। कई बार हम बिना सोचे समझे भी बोल देते हैं। हम बच्चों को भी कैसे सोचना हैं यह सिखा देंगे तो वह चाहे जैसे भी परिस्थिति हो सही सोचेगा तो फिर वह दुख स्पर्श नहीं कर पाएगा। यही है आत्मा का पालन, पोषण , विकास और उत्थान। यही धर्म है। धर्म हमें सिखाता है कैसे सोचें, कैसे निर्णय ले पाए। आज बड़े होकर भी हम उलझन में रहते हैं। हम पढ़ाई करने के बाद भी निर्णय नहीं ले पाते हैं। कुछ निर्णय लेते भी है तो उसका कोई आधार भी नहीं होता है। क्या बनना है क्यों बनना है यह जवाब नहीं दे पाते। इसलिए हमें हमेशा सही सोच की ओर ध्यान देना होगा। सोच सकारात्मक और एक होती है नकारात्मकता। पर उससे भी बड़ी होती है सोच वास्तविकता की। धर्म वास्तविकता सिखाती है। वास्तविकता ही हमें जीवन जीना सिखाती है। जीवन में जो भी हो रहा है हमारे सोच के कारण हो रहा है। हम स्वयं से प्रेम नहीं करते इसलिए समस्या आती है। स्वयं के लिए विशेष कुछ नहीं कर रहें। अपना सकारात्मक आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए। उन्होंने कर्ण की हार के पीछे का यही एक मूल कारण बताया। कर्ण को हराना इतना आसान नहीं था। श्री कृष्ण भगवान स्वयं जानते थे कि कर्ण में जीत की आत्मविश्वास बहुत है। लेकिन कैसे भी करके उसके आत्मविश्वास को तोड़ा गया। तब जाकर कर्ण हार पाया। परीक्षार्थियों के संबंध में कहा कि अधिकतर बच्चे यही सोचते हैं कि ऐसा हो गया वैसा होगा तो क्या करूंगा। असफलता को भी स्वीकार करना चाहिए। हमें सोचना चाहिए कि अगर फेल भी हो रहे हैं तो वह हमारे लिए अच्छा हो रहा है। या तो मैं जीतूंगा या मैं सीखूंगा। हारूंगा कभी नहीं। हार हमें कुछ न कुछ सिखाती है। ताकि मैं बड़ी जीत के लिए तैयार हो सकूं। हमें अपनी सोच बदलनी है। शुरुआत भजनों और माला फेरने से करें। बदलाव व्यक्ति को तकलीफ देता है इसलिए वह जल्दी राजी नहीं होता है। इसलिए कितना भी धर्म करो धार्मिक वही है जो खुद को सुधारने के लिए राजी है और उसमें लग जाए। बार-बार खुद को बदलने के बारे में सोचिए। मंदिर में जो प्रार्थना करते हैं वह यही प्रार्थना है कि मुझे बदलना है। मेरे दुख का कारण मैं हूं। यह गांठ बांध लीजिए और उसे दोहराइये। मंदिर धाम तीर्थ सब हमारे सोच को बदलने की ही प्रक्रिया का हिस्सा है। जिन्होंने खुद को बदला है उन्हें ही अप्रतिम सुख मिला है। खुद को बदलना चाहे तो परेशानी भी होगी। लेकिन वह सिर्फ मन का वहम होता है जो आपको बाहर दिखाई दे रहा लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं है। वह हमारी सोच के कारण हमें विपरीत दिखाई देता है। महाभारत के सभी चरित्र हमें जीवन की कई सच्चाईयो को उजागर करते हैं।
इन सवालों के साथ करें खुद को बदलने की शुरुआत,कि
मैं इस लायक नहीं हूं, दूसरे मुझे कम चाहते हैं, मुझे कम मिलते हैं दूसरे को ज्यादा मिलते हैं,इस तरह की कोई भी गलत सोच आपके भीतर है तो वैसा बिलकुल नहीं है। जितने भी नकारात्मक सोच है उसे त्याग दीजिए। शुरुआत यहीं से करिए। खुद से प्रेम करना सीखना है और सोचे कि हम कहां-कहां अच्छी चीज को टाल रहे हैं। काम को व्यवस्थित करिए। तुलनात्मक भाव से दूर रहिए। अगर गलत को गलत मानेंगे तो वह धीरे-धीरे आपके जीवन से हटने लगेगा। जो बुरे विचार की धारा बह रही है उसे दूर करना है। अब मैं बदलना चाहता हूं इस बात को दोहराते हुए प्रतिदिन माला फेरिए और लिख लीजिए कि आप क्या-क्या बदलना चाहते हैं।एक दिन जीवन में जो आप चाहते हैं अवश्य मिलेगा।प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.30 से 9.30तक जारी है।

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