आज के कहानी ” माटी के गणेश “



ए कहानी पांच झन संगवारी के हरे . जे नान नान लइका रीहिस.

उकरो इच्छा होय के हमु मन गणेश भगवान मढ़ातेन, फेर गणेश मढ़ाय म बड़ खर्चा आथे. सबों कोई रातकुन गणेश पंडाल ले परसाद झोंके के बाद चंदा अंजोरी म गाड़ा म बईठे सोचत रीहिस अगले बछर हमु मन गणेश मढ़ातेन का??
एक झन जेखर नाव दूरगु हे कथे…
दुरगु: भाई मोला तो घर म दू रुपया बस देथे वाहु इतवार बस के
फल्लू : मोला तो दे घलो निही
पप्पू: कतना रुपया म गणेश माड़ जहि

मोटू : गणेश ल हमन माटी के बनाबो ओखर से पईसा बांच जहि
दूरगु: अऊ सतपाल महाराज ल पढ़ा लेबो

काहत सबों कोई हासे ललग गे 

एक साल के बाद..

रात होगे सबों कोई आगे
फेर महाराज नी अइस

मोटू : ए निपोर महराज के रोज के चक्कर ए . जात तो काकी ल पूछ के आबे , काहते रीहिस कि

ओ तीन ले महाराज आवत रीहिस हे..

मोटू महाराज ल
कइसे बे महाराज तोला नी बताए रिहेव आज हमर इंपाटेंट मीटिंग हे

महाराज: अबे दाई ह आज कांदा भाजी रांधे रीहिस

4 घाव चल दे हो तरिया बड़ झारत हे

दूरगु: ता अइसे नी बताते

महाराज: जल्दी बताओ का मीटिंग मोर पेट पिराय सही अऊ लागत हे..

पप्पू: रुक न बे ले एला खा कहीके
अपन थैली ले काला तो निकाल के दिस

महाराज मुहु म गप ले डाल दिस

महाराज: का हरे रे मस्त लागिस

पप्पू: अरे कुछु नो हरे काली बबा के थैली म पईसा टमड़त रिहेंव, पईसा तो नी मिलीस , माखुर (खैनी) ल धर के ला लेव

महाराज: चुप बे का का खवाथस कहीके उल्टी कर डरिस

सबों कोई पिलान बनाथे पहिली तो गणेश बनाना हे

मोटू : कोई ल आथे बनाय ल
फल्लू: कुंजू कका कर जाबो देखे ल ओ बनाथे
सबों कोई पेंटर का चल दिस अऊ एक एक ठन ल देखे ल गे कईसे बनात हे का का माटी म डालथे

सबो चीज ल तो देख डरिस .फेर सवाल ए रीहिस माटी कहां ले लान

काबर की ओ मन जे गांव म रथे ओ तो मूरमहा माटी म बसे हे

कुंजू कका ल पुछिस ता ओ बताइस. गांव ले 3 कोस दुरिहा डोगरी के उपर बन के बीच म एक ठन भरदाहा तरिया जीहा के माटी एक दम चिकना हे. फेर तुमन मत जहु खतरा हे ऊहा..

अगले दिन सबों कोई बोरी अऊ कुदारी ल धर के माटी के तलास म भरदहा तरिया डहर निकल गे रीहिस.

थोड़कन दुरिहा गिस तहन ओ मन ल एक ठन नदिया मिलथे ,

अब समस्या ए रीहिस ये नदिया ल कईसे पार करन

सबों संगवारी म मोटू के दिमाग़ अईसन काम म बड़ चलथे, ऊही तीर मन मेर माढ़े बड़ा कस लकड़ी अऊ अमरबेल ल सकेल के एक ठन डोंगा बना डरिस .

सबों कोई डोंगा म बईठ के नदिया ल पार करे बर निकल गे.

जइसे सबों कोई बीच गढ्ढी म पहुचिस डोंगा ह हिले ल लग गे

सबों कोइ का देखथे की दू ठन मगर घेर के पानी म बईठे
महाराज: का हरे भाई मोला डर लागत हे, डर के महराज पैंट म मूत डारिस
सबके पोटा कांपे ल लग गे .
महराज: मे कहे रिहेव न कुंजू कका मत जाव कहे रीहिस न निपोर हो

पप्पू: चुप न बे रोनहा

महाराज मगर ल : मोला छोड़ दे मगर भईया मोर तो सादी घलो नी हो हे काहत रोए ल लग गे.

मगर: नी छोड़ सको रे मोर डऊकी कहे हे आज खाली हाथ आबे ते घर म घुसेल नी देव

दूरगु अऊ पप्पू थोड़ा समझदार रीहिस
ओ दूनो कोई दिमाग लगइस
दूनो कोई खुसुर फुसुर करे एक्टिंग करे ल लग गे.
दुनो कोई ल देख के मगर:

कुछ भी करलेव तुमन बच के नी जा सको आज तो पार्टी होही

पप्पू दूरगु ल : दूरगु मे तो मस्त भरदाहा तरिया के मछरी लहू कहे रिहेव भाई, फेर छोड़, मगर भाई ल हमन खान दे.

मगर: मछरी ! वहु भरदहा तरिया के
मगर पप्पू मन के गोठ म फस गे
पप्पू: ता सुने हो भरदहा तरिया के मछरी बड़ मीठ रथे. हमन आती खानी भऊजी बर लाबो कहत रहेन, फेर छोड़ । ते हमन केकडू टूरा मन ल तोर डऊकी कर लेजा, तुहि ल मगर भऊजी अऊ उल्टा गारी दीही…

मगर सोच म परगे। ए मन ल लेगहु त केकडु हे, वईसे भी बच के जहि कहां ईही तीन ले तो आही कहिके छोड़ दिस

सबों कोई डोंगा ले नदिया ल पार कर डरिस

आघू एक ठन अऊ परोबलम अगोरा करत रीहिस
एक कन चले के बाद चियाबारी के बन हर आगे ऊहचो बरहा हा हाथ गोड़ धो के ईकरे मन के अगोरा करत रीहिस

बरहा: ए टूरा हो तुमन ल नी बताईस ईहा जे आथे वो जिंदा बच के नी जाय .

एक बार फेर पप्पू अऊ दूरगु ह दिमाग़ लगईस
पप्पू: वा कईसे बात करथस गा हमर गांव के मन काहत रीहिस हे बन के बरहा बड़ दयालु के काहत रीहिस.

बरहा अपन तारीफ सुन के गदगद होगे
बरहा: अइसे का, अरे मे तो मोला गारी देत होही काहत रिहेव.
ले कोई बुता होही ते बताहु कहीके तुमन जाव कही दिस …

थोड़ कन अऊ चलिस ताहन
कोलिहा हुआ हुआ करत आघु म टेक दिस

कोलिहा: welcome to कोलिहा के ठऊर
पप्पू अउ दूरगु समझ गे कि
कोलिहा बर मगरअऊ बरहा जईसे बुध नी बना सकन..

पप्पू: हमन नान नान लइका ल खाके का ही मिलही, हमन छोड़ दे का पता कब हमन तोर काम आ जान
कोलिहा: ते बोनचांटी टूरा मोर काम आबे, ले आज मोर पेट भरे हे.ले तहु मन का सुरयहु कोई छोड़े रीहिस फेर आती खानी नी बांचो…
काहत छोड़ दिस…

आखिरकार 3 कोस चले के बाद
भरदहा तरिया पहुंच गे
अऊ फेकू महाराज के start होगे
महाराज : देख बेटा मोर दिमाग ले कईसे तीनों खतरनाक जानवर मन ले बच के आ गेन
पप्पू: हाव गा तभे तो मे पैंट म मूत डार रिहेव
ए कहीके सबों कोई महराज उपर हासे ल लग गे
सबों कोई मगर, बरहा अऊ कोलिहा मन ल मना के
माटी का खोज म आगे बड़ गे रीहिस. अऊ पहाड़ के उपर म चढ़ जाथे उपर ले देखथे आघू म बड़े जन तरिया दिखथे, वो भरदाहा तरिया होथे
सबों के खुसी के ठिकाना नी रहाय
सबो कोई झूम के नाचे ल लागथे

सबों कोई कुदारी म माटी ल खनथे अऊ बोरी म भरथे. सबों कोई थक गे रीहिस अऊ भूख तलोक लागत रीहिस.
सबों कोई खाय के तलास म खोजे ल लग गे. तरिया के एक तीर म सीता के फर फरे रीहिस सबों कोई खईस अऊ बोरी म माटी ल धर के निकल गे …

पर समस्या ए रीहिस की मगरमच्छ अऊ कोलिहा ले कईसे बच के जाबो
पप्पू : परेसान झन होवव. गणेस भगवान सब बने करही
कहीके सबों कोई गणेस भगवान के नांव लेके भरदाहा तरिया ले माटी ल धर के निकल गे .

जब आघू गिस ता देखथे कोलिहा के बन म कोई नी हे
महाराज : अबे ए कोलिहा निपोर कहां चल देहे

मोटू : छोड़े न चल ओखर आय ली पहिली निकल जथन कहीके
निकलने वाला रीहिस
कि काखरो कहराय के आवाज़ आइस.

जाके के देखिस ता कोलिहा ह सीकरी के फांदा म फंस गे रीहिस
महाराज: बने होहिस हमन ल खाबो केहे रिहेस. जा भगवान तुहि ल फंसा दिस.
कोलिहा: मोर मदद करो, सीकारी आही ते मोला मार डारही
मोटू : अच्छा ताहन ते हमन खा डारस. चलो रे एला मरन दे कहीके जाय ल लाग गे
पप्पू: रुकव संगवारी, मानथो ए हमन खाना चाहत रीहिस फेर मोर दाई कथे, कोई मुसीबत म हे ता ओला छोड़ के नी जाय भले, दुस्मन घलो काबर राहय
कहीके पप्पू अउ दूरगु कोलिहा के फांदा ल काट दिस

कोलिहा: मे हांस के किहे रिहेव तुमन बोनचांटी कहां मोर काम आहू, अउ तूहे मन काम आ हो कहीके सरमिंदा होगे.

कोलिहा अऊ बरहा ले बिदा लेके सबों कोई नदिया डाहर निकल गे.

समसिया ए रीहिस मगर ल का मूहू देखाबो..

एक कन रेंगे के महाराज के गोड़ फिसल गे अऊ ओ जाके लद्दी म गिर गे सब कोई हांसे ल लग गे फेर दूरगु नी हासिस, ए सब देख के फल्लु पुछथे का होगे रे दूरगु…

दूरगू के दिमाग़ म कुछु तो गोठ चलत रीहिस, अचानक दूरगु सबों संगवारी ल लद्दी म धकेल दिस अऊ अपनो कूद दिस…

सबों कोई ल समझ नी आत रीहिस अइसन काबर करिस..

दुरगु किहिस जईसे महाराज लद्दी म गिरीस माटी जईसे दिखत रीहिस. हमु मन अइसने बन के जाबो त मगरमच्छ नी पहिचान सके.

सबों कोई माटी ल धर के निकल गे
सबों कोई नदिया के तीर म आगे.
अऊ मोटू बनाय डोंगा म चढ़गे.

सबों कोई धीरे धीरे नदिया ल पार करत रीहिस. सबों कोई मिटका के डोंगा म बईठे रीहिस. बीच गढ्ढी म गिस ताहन मगर देखथे, कि डोंगा म तो सिरीफ माटी बस हे. सबों कोई माटी चुपरे के वजह से माटी जईसे देखत रीहिस. ता ओ डोंगा ल जाय ल दिस.
अइसन करत वो मन माटी ल घर म ला डरिस.
सबों कोई सुग्घर गणेस के मूरत बनइस. अऊ ओखर ठउर म मढ़ाइस..

आभार कहानी पढ़े बर..

                                                             फलेंद्र कुमार 
                                                   ग्राम - घीना, जिला बालोद छत्तीसगढ़ 

वर्तमान पता – पटना बिहार

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