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मधुर साहित्य परिषद की विचार गोष्ठी सम्पन्न

बालोद। पोरा त्योहार की पूर्व संध्या पर मधुर साहित्य परिषद की विचार गोष्ठी गायत्री मंदिर परिसर डौंडी लोहारा में संपन्न हुई। चर्चा का विषय था “पोरा त्योहार का लोक जीवन में मान्यता”
गोष्ठी की शुरुआत माता गायत्री की पूजन वंदन से हुई।
सर्व प्रथम संबलपुर से पधारे वीरेंद्र कुमार अजनबी ने अपनी काव्यात्मक शैली में पोरा त्योहार को धान की फसल में गर्भधारण करने का उत्सव बताया।
उन्होंने कहा कि
नदिया बैला पोरा जाता ,छत्तीसगढ़ के पहिचान हमर।
ठेठरी खुरमी सोहारी खाबो, गरभ धरत हे धान हमर ।
इस विचार को आगे बढ़ाते हुए देवरी बंगला से आए अजय कुमार चौहान ने इस पोरा त्योहार में किसान का साथी बैल को नंदी बैल की तरह सजाकर पूजा कर बैल दौड़ प्रतियोगिता रखकर उत्सव में हर्ष उल्लास भरने की परंपरा को बताया तथा बड़ों के अलावा इस उत्सव में बच्चों के लिए मिट्टी के नंदी बैल और पोरा जाता व रसोई में उपयोगी बर्तनों जैसे मिट्टी के खिलौने द्वारा जन जीवन के संस्कार प्रत्यारोपण की परंपरा को बताया।
रायपुरा के वरिष्ठ साहित्यकार देवनारायण नगरिहा ने पोरा त्यौहार का आध्यात्मिक तथ्य बताया ।जिसमें बालिकाओं द्वारा खेले जाने वाले पोरा जाता को शिवलिंग के आकार में बताया जिसमें शिवजी व पार्वती के दर्शन होते हैं ।जिनके सवारी नंदी बैल है ।जिसे पूजा कर सुख समृद्धि की कामना की जाती है ।


मधुर साहित्य परिषद तहसील इकाई डौंडी लोहारा के अध्यक्ष कन्हैया लाल बारले ने छत्तीसगढ़ के त्योहारों को गौ भक्ति की परिपाटी बताया। किसानों के जीवन का अभिन्न साथी गाय बैल भैंस जिसे सभी त्योहारों व उत्सवों में शामिल करते हैं । वे गाय बैल को सर्वोपरि मान कर पूजा करते हैं। उनकी गौ भक्ति साल भर चलती रहती है । हरेली में गाय बैलों को गेहूं आटा के कच्चा लोई खिलाते हैं । पोरा में मिट्टी के नंदी बैल की पूजा की जाती हैं ।और दिवाली में गौ माता को साक्षात लक्ष्मी मानकर पूजा करते हैं और खिचड़ी भी खिलते हैं ।अर्थात पोरा त्यौहार भी गौ भक्ति का एक उत्सव है।
धनगांव के सरपंच व युवा कवि तोषण कुमार चुरेंद्र ने कहा कि पोरा पोर शब्द से बना है जिसका अर्थ उत्पत्ति से है । अर्थात इस तिथि को धान गर्भधारण करता है। छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में रचे बसे विभिन्न लोक संस्कृति व परंपराओं को अक्ति त्यौहार से लेकर हरेली रक्षाबंधन पोरा नारबोद तीजा दिवाली तक की जानकारी दे डाली।
अंत में सभी साहित्यकारों ने बारी-बारी से काव्य पाठ किए। जिसमें छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं परंपरा से जुड़ी रचनाएं शामिल थी। कार्यक्रम का सफल संचालन अंडी के युवा साहित्यकार श्री पीतांबर साहू ने किया। उन्होंने भी अपना विचार रखा। इस अवसर पर साहित्यकारों के अलावा बहुत से लोग उपस्थित थे।
कन्हैया लाल बारले के द्वारा उपस्थित साहित्यकार व श्रोताओं का आभार व्यक्त किया गया।तत्पश्चात गोष्ठी की समापन की घोषणा हुई।

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