बालोद। बालोद से करीब 35 किमी दूर ग्राम डेंगरापार (घीना) के हरदेलाल मंदिर में मंगलवार को देव दशहरा पर्व मनाया गया। इस अवसर पर करीब पांच हजार ग्रामीणों की भीड़ जुटी।

इस मंदिर परिसर में हर साल नवरात्रि के बाद आने वाले मंगलवार को इसी तरह से ग्रामीण यहां आकर हरदेलाल को मिट्टी से बने घोड़े चढ़ाया जाता है।इस बार दशहरा के दिन ही देव दशहरा पड़ा। इस मौके पर अपनी मनोकामना पूरी होने पर सैकड़ो लोग मिट्टी के घोड़ा चढ़ाने के लिए पहुंचे।

इस दौरान विधायक कुंवर सिंह निषाद जो वर्तमान में गुण्डरदेही विधानसभा सीट पर फिर से कांग्रेस के प्रत्याशी है, वह भी है मिट्टी का घोड़ा लेकर हरदेलाल को अर्पित करने के लिए पहुंचे थे। इसके अलावा बालोद जिला की नहीं बल्कि दूसरे जिले से लोग भी करीब 300 की संख्या में घोड़े अर्पित करने के लिए पहुंचे।
पूरी करते हैं मनोकामना
ग्रामीणों की मान्यता है कि मिट्टी के बने घोड़े चढ़ाने से हरदे लाल उनकी मनोकामना पूरी करते हैं। इस बार के देव दशहरा में भी करीब तीन सौ से ज्यादा लोगों ने घोड़े चढ़ाए। इस क्षेत्र के ग्रामीणों ने हरदेलाल को भगवान का दर्जा दिया है। मन्नत पूरी होने के बाद ही वे देव दशहरा को मिट्टी का घोड़ा लेकर हरदेलाल को भेंट करने पहुंचते हैं। घोड़ा चढ़ाने के लिए डेंगरापार अ., नवागांव, घीना, कसहीकला, गड़ईनडीह, लासाटोला गांव से सेवा गाते हुए डांग डोरी लेकर रैली के रूप ग्रामीण मंदिर पहुंचे। जहां देव दशहरा पर्व धूमधाम से मनाया गया। लोगों ने यहां पूजा-अर्चना की। जिनकी मनोकामना पूरी हुई उन्होंने मिट्टी से बने घोड़े चढ़ाए। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मन्नत पूरी होने पर यहां लोग दोबारा आते हैं।
महिलाओं का प्रवेश वर्जित
महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित है। महिलाओं का प्रसाद भी खाना वर्जित होता है। यदि कोई गर्भवती है तो उसके पति को भी प्रसाद खाने की मनाही होती है। डेंगरापार में अलग से दशहरा नहीं मनाया जाता, न ही रावण मारा जाता है। बताया गया कि इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
घोड़ा चढ़ाने की परंपरा सौ साल पुरानी
ग्रामीण, तामेश्वर सिन्हा सुमित सिन्हा, हेयांश सिन्हा ने बताया कि करीब सौ साल से यह परंपरा चली आ रही है। जब से होश संभाले हैं, तब से हरदेलाल बाबा के मंदिर में मिट्टी का घोड़ा चढ़ाने वालों को देख रहे हैं। अब तक हजारों की संख्या में श्रद्धालु मिट्टी के घोड़े चढ़ा चुके हैं।
घोड़े की सवारी कर आए थे हरदेलाल
ग्रामीण डालचंद जैन, लतेल यादव का कहना है कि हरदेलाल घोड़े में सवार होकर यहां आए थे और लोगों का दुख-दूर करते थे। उनके समय के लोगों ने उन्हें देवता स्वरूप मान लिया। करीब 85 साल पहले जब घीना बांध बना तब लोगों ने हरदेलाल का मंदिर बनवा दिया।
