छग के कैलाश कहे जाने वाले पर्रेगुड़ा में 10 अक्टूबर को होगा भोला दशहरा, पढ़िए इस जगह की अनूठी कहानी



शामिल होंगे मंत्री अमरजीत भगत,पद्मश्री डॉ आरएस बारले का होगा विशेष नागरिक अभिनंदन होंगे विविध आयोजन

बालोद । परंपरानुसार इस वर्ष भी ग्राम पर्रेगुड़ा में भोलापठार विकास समिति एवं बहुउद्देश्यीय जनजागरण सेवा समिति और बोलबम युवा संघ के संयुक्त तत्वावधान में रविवार 10 अक्टूबर को भोलापठार मंदिर में भव्य भोला दशहरा व नवाखाई महोत्सव मनाया जाएगा। भोलापठार कन्नेवाड़ा से दक्षिण की ओर तीन किमी की दूरी पर घने जंगलों के बीच स्थित है। इसी सुंदरता और प्रकृति की छटा के मध्य श्रद्घालु मंदिर में भोलेबाबा के दर्शन के लिए आते हैं। भोलापठार विकास समिति अध्यक्ष रामजी ठाकुर ने बताया कि कार्यक्रम सुबह 10 बजे से प्रारंभ हो जाएगा जिसमे जय गढ़िया बाबा आदिवासी मांदरी नृत्य सरइटोला धमतरी, जय गोपाल राउत नाच पार्टी लिमोरा करहीभदर एवं सांस्कृतिक लोककला मंच ‘बालोद के रंग’ की प्रस्तुति होगी।

ये रहेंगे कार्यक्रम के अतिथि

भोलापठार मंदिर समिति मीडिया प्रभारी मोहित भास्कर ने बताया कि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उपभोक्ता संरक्षण व खाद्य मंत्री अमरजीत भगत होंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता गंभीर सिंह ठाकुर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी दुर्ग द्वारा किया जाएगा। इसके अलावा पद्मश्री डॉ आरएस बारले के प्रथम नगर आगमन पर विशेष नागरिक अभिनंदन होगा। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में संगीता सिन्हा विधायक संजारी बालोद, अजय मोहन सहाय छग फिल्म अभिनेता रायपुर, बीएल कुर्रे पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी व समाजसेवी, कविलाश टंडन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक यातायात दुर्ग, नितेश गेंद्रे वरिष्ठ समाजसेवी, घनाराम रावटे ब्लाक मेडिकल आफिसर गुरुर, रमेश ठाकुर संपादक गोंडवाना स्वदेश पत्रिका कार्यक्रम में शामिल होंगे।

इसलिए मनाते हैं महोत्सव

मान्यता है कि कलयुग में इस स्थान को जानने के लिए भगवान ने एक लीला रची जिसमें एक भगत जिसे बोजा भगत के नाम से जाना जाता है का प्राकट्य हुआ। बोजा भगत व परिवार का मठ आज भी यहां विद्यमान है। इस भगत के समय से यहां ग्रामीण मेले का आयोजन करते आ रहे हैं, जिसे भोला दशहरा कहते हैं। भगत जो कि आदिवासी गोंड था व उक्त ग्राम भी आदिवासी बाहुल्यता ग्राम है, इसलिए सभी आदिवासी इसी दिन भोलापठार में नवाखाई महोत्सव मनाते हैं।

इसे मानते हैं छग का कैलाश- 400 फीट ऊपर पहाड़ पर है शिव का मंदिर, मान्यता है कि यहां के कुंड का जल कभी सूखता नहीं, बारिश होने में यदि देरी हो तो किसान यहां पहुंचते हैं पूजा करने

बालोद जिला मुख्यालय से 18 किमी दूर ग्राम पर्रेगुड़ा स्थित 400 फीट ऊंची पहाड़ी पर भोलेनाथ का मंदिर है। स्थानीय लोग इसे छत्तीसगढ़ का कैलाश भी कहते हैं। क्योंकि यहां प्राकृतिक रूप से पत्थरों का ढ़ेर लगा हुआ है। 184 सीढ़ी ऊपर चढ़ने के बाद कई किमी दूर का नजारा यहां से देखा जा सकता है। मंदिर समिति के पुरुषोत्तम निषाद बताते हैं कि मंदिर में एक छोटा सा कुंड है। जिसे कई पीढ़ियों से देखते और पूजा करते आ रहे हैं, यह कुंड पहाड़ के इतनी ऊंचाइयों में होने के बाद भी कभी नहीं सूखता। पहले जब गांव में नल या बोर नहीं हुआ करते थे, तब लोग गर्मी के दिनों में यहीं का पानी पी कर गुजारा करते थे। आस-पास के गांव में जब नवा खाई (भोला दशहरा) का आयोजन होता है, तब यहां के जल का उपयोग किया जाता है। जो आयोजन इस बार 10 अक्टूबर को है।

सावन में पांच जिले के लोग यहां आते हैं

पर्रेगुड़ा के पंचराम मंडावी बताते हैं कि सावन में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। अंतिम सोमवार को बालोद, दुर्ग, धमतरी, नांदगांव और रायपुर जिले से काफी संख्या में भक्त जल चढ़ाने यहां पहुंचते हैं। वहीं पर्रेगुड़ा, करहीभदर, कन्नेवाड़ा, सांकरा, लिमोरा, अमोरा के साथ आस-पास के ग्रामीण अंतिम सोमवार को रामघाट बालोद से जल लेकर पैदल मंदिर पहुंचते हैं।

शंकर भगवान विराजित इसलिए नाम भोला पठार

मंदिर समिति के महेन्द्र तारम बताते हैं कि वह बचपन से यहां पूजा करने पहुंच रहे हैं। यह जिले में सिर्फ एक ऐसा मंदिर है जहां शंकर भगवान विराजमान हैं। इसलिए इसे भोला पठार के नाम से जाना जाता है। जिसके कई साक्ष्य मंदिर में आज भी मौजूद हैं, जैसे चट्टान में एक पैर के निशान की आकृति है, इसे भगवान भीम का पदचिन्ह कहा जाता है।

मंदिर के नीचे गुफा है

मंदिर के पुजारी चेतन राम नेताम बताते हैं कि बारिश में देरी होने पर यहां यज्ञ व पूजा होता है। आस-पास के गांव वाले उपवास रहकर आराधना करते हैं। मंदिर के नीचे गुफा है। हमारे पूर्वज बताते थे कि वहां पहले शेर रहा करते थे। अब कभी-कभी मंदिर में भालू देखने को मिलता है। जो यहां के नारियल खाकर लौट जाते हैं। परिसर में मां काली, दुर्गा, राम-लक्षमण और हनुमान भगवान के साथ-साथ बहुत से देवी-देवता विराजमान हैं। महाशिवरात्रि में मंत्रजाप, अखंड रामायण के साथ ही विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है।

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