आज पंचमी विशेष- दुधली के दो मंदिरों की अनोखी कहानी- एक माता का मंदिर महिलाओं के लिए अष्टमी के दिन ही खुलता है तो दूसरे मंदिर में कुत्ते की वफादारी की होती है पूजा, जोत भी जल रहे



बालोद। आज चतुर्थी और पंचमी दोनों एक साथ है। शारदीय नवरात्रि में यह संयोग बना हुआ है। पंचमी पर भक्त मंदिरों में देवी प्रतिमा को श्रृंगार सामान भेंट करेंगे, उन्हें चुनरी चढ़ाएंगे। तरह तरह से उपवास व अन्य साधनों से माता की आराधना होगी। इस पंचमी पर आज बालोद से राजनांदगांव मार्ग पर स्थित ग्राम दुधली (मालीघोरी) के दो अनूठे मंदिरों की कहानी पेश कर रहे हैं जो धार्मिक आस्था के केंद्र बिंदु के साथ-साथ कौतूहल का भी विषय है। इसमें एक देवी का मंदिर है तो दूसरा कुत्ते की वफादारी का मंदिर। नवरात्रि में दोनों ही जगह पर आस्था के जोत जल रहे हैं। पंचमी पर हम इन्ही कुछ खास देवी मंदिरों के बारे में बता रहे हैं। जहां पर इस नवरात्रि भी मनोकामना जोत जल रहे हैं। उन मंदिरों की खासियत से यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है। पहले बात कर रहे हैं दुधली के मां दंतेश्वरी मंदिर की। जो हर साल दोनों नवरात्रि के अष्टमी पर महिलाओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। बाकी समय सिर्फ साल में एक बार मेले के दिन इसे महिलाओं के लिए खोला जाता है। जो कि प्रति वर्ष छेरछेरा पुन्नी के पहले आने वाले शनिवार को होता है। यानी यूं कहें कि महिलाओं के लिए साल में तीन अवसर पर ही यह मंदिर खोले जाते हैं। इसी खास मान्यताओं के चलते इसकी ख्याति आसपास के कई गांव में फैली हुई है।
12 गांव के बरगहिन के नाम से जाने जाने वाली मां दंतेश्वरी मंदिर दुधली (मालीघोरी) में जोत कलश स्थापना की गई है। बताया जाता है कि पहले पूर्वजों के द्वारा जुड़वारो के दिन 12 गांव की लोगों द्वारा हल्दी चावल तेल लेकर दंतेश्वरी प्रांगण में आते थे। 12 गांव के लोग दंतेश्वरी माता से बिना अनुमति के कुछ भी गांव के देवी देवता का काम नहीं करते थे। मंडई के समय पहले 12 गांव के डांग डोरी भी आते थे एवं सिर्फ मंडई एवं दोनों नवरात्रि के अष्टमी के ही दिन महिलाओं के लिए मां दंतेश्वरी मंदिर द्वार खोला जाता है। मान्यता अनुसार बाकी समय महिलाओं के लिए प्रवेश वर्जित रहता है एवं प्रत्येक सोमवार एवं गुरुवार को भी मंदिर का द्वार खुलता है लेकिन महिलाओं के लिए प्रवेश वर्जित रहता है। इसके पीछे असल कारण क्या है ये तो मालूम नही लेकिन वर्षों पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को आज की पीढ़ी भी निभा रही। इसमें गांव की महिलाओं को भी आपत्ति नही है।

वफादारी के लिए प्रसिद्ध है कुकुर देव मंदिर , जल रहे जोत, शिव के नंदी की तरह कुत्ते की मूर्ति यहां पूजी जाती है

इसी तरह दुधली के ही कुकुर देव मंदिर की वैसे तो देवी मंदिरों में गिनती नहीं आती है लेकिन यहां दोनों नवरात्रि में जोत जलाए जाते हैं तो विशेष अनुष्ठान भी होते हैं । इस मंदिर की खासियत पूरे छत्तीसगढ़ में है। वह इसलिए कि यह कुत्तों की वफादारी के लिए जाना जाता है। यह अपने आप में एक अनूठा मंदिर है। श्री कुकुर देव शिव मंदिर खपरी (मालीघोरी) में ज्योत स्थापना की गई है। मालीघोरी के खपरी गांव में “कुकुरदेव” नाम का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर किसी देवी-देवता को नहीं बल्कि कुत्ते को समर्पित है, हालांकि साथ में शिवलिंग आदि प्रतिमाएं स्थित है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से कुकुर खांसी व कुत्ते के काटने का कोई भय नहीं रहता है।

ये है मंदिर का इतिहास

इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं-15 वीं शताब्दी में कराया गया था। मंदिर के गर्भगृह में कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है और उसके बगल में एक शिवलिंग भी है। कुकुर देव मंदिर 200 मीटर के दायरे में फैला है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमा लगाई गई है। लोग शिव जी के साथ-साथ कुत्ते (कुकुरदेव) की वैसे ही पूजा करते हैं जैसे शिवमंदिरों में नंदी की पूजा होती है। यह मंदिर दरअसल भैरव स्मारक है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के शिखर के चारों ओर दीवार पर नागों का अंकन किया गया है। इस मंदिर का निर्माण हालांकि फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं-15 वीं शताब्दी में कराया गया था। इस मंदिर के प्रांगण में स्पष्ट लिपियुक्त शिलालेख भी है, जिस पर बंजारों की बस्ती, चांद-सूरज और तारों की आकृति बनी हुई है। राम लक्ष्मण और शत्रुघ्न की प्रतिमा भी रखी गई है। मंदिर के प्रांगण में कुत्ते की प्रतिमा भी स्थापित है। इसके अलावा एक ही पत्थर से बनी दो फीट की गणेश प्रतिमा भी मंदिर में स्थापित है। जनश्रुति के अनुसार, कभी यहां बंजारों की बस्ती थी। मालीघोरी नाम के बंजारे के पास एक पालतू कुत्ता था। अकाल पड़ने के कारण बंजारे को अपने प्रिय कुत्ते को साहूकार के पास गिरवी रखना पड़ा। इसी बीच, साहूकार के घर चोरी हो गई। कुत्ते ने चोरों को साहूकार के घर से चोरी का माल समीप के तालाब में छुपाते देख लिया था। सुबह कुत्ता साहूकार को चोरी का सामान छुपाए स्थान पर ले गया और साहूकार को चोरी का सामान भी मिल गया।
कुत्ते की वफादारी से अवगत होते ही उसने सारा विवरण एक कागज में लिखकर उसके गले में बांध दिया और असली मालिक के पास जाने के लिए उसे मुक्त कर दिया। अपने कुत्ते को साहूकार के घर से लौटकर आया देखकर बंजारे ने डंडे से पीट-पीटकर कुत्ते को मार डाला।
कुत्ते के मरने के बाद उसके गले में बंधे पत्र को देखकर उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और बंजारे ने अपने प्रिय स्वामी भक्त कुत्ते की याद में मंदिर प्रांगण में ही कुकुर समाधि बनवा दी। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए बंजारे ने एक मंदिर की चाहरदीवारी के भीतर कुत्ते की मूर्ति प्राण प्रतिष्ठित करवा दी। तभी से यह स्थान कुकुरदेव मंदिर के नाम से विख्यात हो गया। मंदिर के सामने की सड़क के पार से मालीघोरी गांव शुरू होता है जिसका नामकरण मालीघोरी बंजारा के नाम पर हुआ है। इस मंदिर में वैसे लोग भी आते हैं, जिन्हें कुत्ते ने काट लिया हो। यहां हालांकि किसी का इलाज तो नहीं होता, लेकिन ऐसा विश्वास है कि यहां आने से वह व्यक्ति ठीक हो जाता है। ‘कुकुरदेव मंदिर’ का बोर्ड देखकर कौतूहलवश भी लोग यहां आते हैं।

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