आज 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है। विश्व भर में लोग आज के दिन पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हैं। पौधे लगाते हैं उन्हें बड़ा करने का सपना देखते हैं। पर सिर्फ पौधे लगाना उन्हें पेड़ बनाना ही पर्यावरण संरक्षण का हिस्सा नहीं है। पर्यावरण में और भी बहुत कुछ है जिनका संरक्षण जरूरी है और इसी क्रम में आते हैं खेत खलिहान भी। जहां पर्यावरण संरक्षण के लिए एनजीटी के कुछ नियम भी लागू हुए हैं। पर आज भी छत्तीसगढ़ राज्य की बात हो चाहे पूरे भारत के लोग, एनजीटी के नियमों को दरकिनार कर अपना नियम चलाते हैं। किसान कब सुधरेंगे पता नहीं पर सच्चाई तो यही है कि खेतों में खुलकर पर्यावरण प्रदूषण को बढ़ावा दिया जाता है। आज भी प्रतिबंध के बाद भी खेतों में फसल अवशेष जलाए जाते हैं। जबकि इस पर सख्त पाबंदी है। हमारे आसपास खेतों में ऐसे नजारे मिल ही जाएंगे। ताज्जुब की बात यह है कि इन खेतों में आग लगती नहीं लगाई जाती है। किसान या मजदूर खुद से यहां आग लगाने जाते हैं। उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं होता है कि वे आग लगाकर सिर्फ पैरा या पराली नहीं जला रहे बल्कि कई जिंदगी जला रहे हैं। जो पर्यावरण के हिस्सा होते हैं। किसानों व लोगों को लगता है कि हम सिर्फ पैरा जलाकर कचरा साफ कर रहें हैं पर ऐसा नहीं है। वहां सिर्फ पैरा ही नहीं जलता है।
सरकार को ध्यान देने की जरूरत है
सरकार द्वारा जो नियम बनाया गया है उस पर सख्ती नहीं दिखाई जाती और इसी का फायदा लोग उठाते हैं। नियम सिर्फ कागजों में बने हुए हैं और असल में उसका कोई प्रभाव नहीं दिखता, ना इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई होती है ना ही कोई ठोस कदम उठाया जाता है।
क्या है नया नियम

छत्तीसगढ़ शासन आवास एवं पर्यावरण विभाग द्वारा वायु (प्रदुषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम 1981 की धारा 19 की उपधारा (5) के अंतर्गत फसल कटाई के पश्चात् खेतो में बचे हुये फसल अवशिष्ट को जलाने से वायु प्रदूषण होने अथवा संभावना के मद्देनजर फसल कटाई के पश्चात खेतों में बचे हुये फसल अवशिष्ट को जलाने पर प्रतिबंधित किया गया है। जिसके तहत 02 एकड़ से कम के लिए 2500 रूपए प्रति घटना, 02 से 05 एकड़ तक पाॅच हजार रूपए प्रति घटना एवं 05 एकड़ से अधिक होने पर 15 हजार प्रति घटना एवं 06 माह की सजा एवं अर्थदण्ड करने का प्रावधान हैं। इसमें जिला दंडाधिकारी, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पुलिस अधीक्षक, प्रदुषण एवं नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी को अधिकृत किया गया है।
उल्लेखनीय है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण) ने फसल के अवशेषों को खेतों में जलाने पर प्रतिबंध लगाने के साथ इसे दंडनीय अपराध माना है। फसल अवशेष जलाने पर किसानों को पर्यावरण को होने वाले नुकसान के एवज में हर्जाना भी देना है।
जरा ये भी समझिए-
1 टन धान के फसल अवशेष जलाने पर होता है कितना वायु प्रदुषण

एक टन धान के फसल अवशेष जालने से 03 किलोग्राम कणिका तत्व, 60 किलोग्राम कार्बन मोनो ऑक्साइड, 1460 किलोग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड, 199 किलोग्राम राख एवं 02 किलोग्राम सल्फर डाई ऑक्साइड अवमुक्त होती है, इन गैसों के कारण सामान्य वायु की गुणवत्ता में कमी आती है। जिससे आँखों में जलन एवं त्वचा रोग तथा सूक्ष्म कणों के कारण जीर्ण हर्दय एवं फेफड़ों की बीमारी के रूप में मानव स्वास्थ्य को हानि होती है|
एक टन धान का फसल अवशेष जलाने से लगभग 5.50 किलोग्राम, नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस ऑक्साइड, 25 किलोग्राम पोटेशियम ऑक्साइड, 1.2 किलोग्राम सल्फर, धान के द्वारा शोषित 50 से 70 प्रतिशत सूक्ष्म पोषक तत्व एवं 400 किलोग्राम कार्बन की क्षति होती है, पोषक तत्वों के नष्ट होने से अतिरिक्त मिट्टी के कुछ गुण जैसे: भूमि तापमान, पी.एच. मान उपलब्ध फासफोरस एवं जैविक पदार्थ भी अत्यधिक प्रभावित होते हैं | कृषकों को गेहूं की बुआई की जल्दी होती है तथा खेत की तैयारी में कम समय एवं शीर्घ ही गेहूं की बुआई हो जाए इस उद्देश्य से किसानों द्वारा फसल अवशेष जलाने के दुष्परिणामों को जानते हुए भी फसल अवशेष जला देते हैं, जिसकी रोकथाम करना पर्यावरण के लिए आवशयक है |
