“जब तक मिट्टी पानी है, गुरु कबीर की वाणी है…” — तार्री भरदा में 35 वर्षों से गूंज रही सद्भाव और मानवता की अलख



कबीर जयंती पर उमड़ा श्रद्धा का सागर, संतों ने दिया प्रेम, समानता और मानवता का संदेश

बालोद। जिले के ग्राम तार्री भरदा में इस वर्ष भी सद्गुरु कबीर साहेब की जयंती श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक समरसता के वातावरण में मनाई गई। खास बात यह रही कि यहां पिछले 35 वर्षों से लगातार कबीर जयंती का आयोजन होता आ रहा है। यह आयोजन भक्त श्री बुधकर साहब की स्मृति में किया जाता है, जिनके जीवन का प्रत्येक क्षण कबीर साहेब की वाणी और विचारों को समर्पित रहा।

इस वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा दो बार पड़ने के कारण जगह-जगह दो माह तक कबीर जयंती मनाई जा रही है। तार्री भरदा में आयोजित कार्यक्रम में कबीरपंथी संतों, श्रद्धालुओं एवं ग्रामीणों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही।

कार्यक्रम की शुरुआत जोशीले नारों और कबीर वाणी के उद्घोष के साथ हुई—

“कबीर जयंती मनाएंगे — परम शांति को पाएंगे”
“हिंदू मुस्लिम सिख इसाई — आपस में सब भाई-भाई”
“जब तक मिट्टी पानी है — गुरु कबीर की वाणी है”

इन नारों ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा और सामाजिक भाईचारे से भर दिया।

“मानव तन, सद्गुरु का मिलन और मोक्ष की इच्छा दुर्लभ”

कबीर आश्रम गुरुर के सुयश साहेब ने अपने प्रवचन में कहा कि मानव जीवन, सद्गुरु का सान्निध्य और मोक्ष की इच्छा — ये तीनों अत्यंत दुर्लभ हैं। जिस व्यक्ति को ये तीनों प्राप्त हो जाएं, उसका जीवन सफल हो जाता है।

वहीं संत श्री दिनेंद्र साहेब (कबीर आश्रम दुपचेरा) ने कहा कि लगभग 600 वर्ष पहले कही गई कबीर साहेब की वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उन्होंने कबीर के समानता और मानवता के संदेश को याद करते हुए कहा—

“एकै त्वचा हाड़ मल मूत्र, एक रुधिर एक गुदा
एक बूंद से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शूद्रा।”

उन्होंने कहा कि कबीर साहेब ने जाति, धर्म, संप्रदाय और ऊंच-नीच के भेदभाव को नकारते हुए पूरी मानवता को एकता का संदेश दिया।

“ढाई आखर प्रेम का पढ़े वही पंडित”

कबीर आश्रम करहीभदर के व्यवस्थापक संत श्री सुशांत साहेब ने कहा कि कबीर साहेब प्रेम, भाईचारा और सद्भाव की शिक्षा देते हैं। उन्होंने कहा कि सच्चा पंडित वही है जिसके भीतर दया, क्षमा, विवेक, संतोष और गुरु भक्ति हो।

उन्होंने कबीर का प्रसिद्ध दोहा सुनाते हुए कहा—

“ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।”

संतों ने अंधविश्वास और कट्टरता पर किया प्रहार

पूज्य संत श्री देवेंद्र साहेब ने अपने उद्बोधन में कहा कि कबीर साहेब ने समाज में फैली रूढ़ियों और आडंबरों का हमेशा विरोध किया। उन्होंने कबीर की वाणी उद्धृत करते हुए कहा—

“पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़”
“कांकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।”

उन्होंने लोगों को जीवन में तीन बातों को अपनाने की सीख दी—

  • प्रसन्न रहना सीखें
  • दूसरों को सम्मान दें
  • सबसे मीठा बोलें

भजन, सत्संग और भंडारे में उमड़ी श्रद्धा

कार्यक्रम में दिना बाई साहू, नंदिता, पुष्पा, चित्रलेखा, संत दुलारी पारखी (कांकेर), श्वेता, उपासना (खैरवही), परिधि, हर्षिता (भोपाल), पुष्पेंद्र, प्राची, तृप्ति, पृथ्वी आर्या, डेविड, शारदा (भोपाल), चेतन साहू (तार्री), अनीता, जीवन (गोकुलपुर), भीमसेन (चंदनबिरही), पुरुषोत्तम साहू (खैरवही), मधुबाला, गुमेंद्र, भावना, मंजू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

भजन, पाठ और सत्संग के बाद संतों की पूजा-अर्चना की गई। तत्पश्चात प्रसाद वितरण एवं विशाल भोजन भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की।

मानवता, प्रेम और सद्भाव का जीवंत संदेश बना आयोजन

तार्री भरदा का यह आयोजन केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक एकता, प्रेम, भाईचारे और मानवीय मूल्यों का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। 35 वर्षों से लगातार जारी यह परंपरा गांव में आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक समरसता की मजबूत मिसाल बन चुकी है।

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