पदपादाकुलक4-4-4-4/2-3-3-2-4-2
कुछ तो सोच समझ ले प्राणी। मुख से बोल तोल कर वाणी।
करलो बातें नयी पुरानी। रिश्ते हैं जानी पहचानी।।
कितना मुश्किल जीवन पाया। बचपन यौवन खेल बिताया।
बूढ़ापन में रोग सताया । कंचन काया खाट लुटाया।।
मानुष जन्म मिला अनमोला। फिर अंतस में क्यों विष घोला।
यह तन होगा इक दिन मिट्टी। आएगा जब प्रभु का चिट्ठी।।
लोभ मोह दुर्जन को त्यागो। अब थोड़ा भाव भजन में जागो।
मन मानवता से मनवाओ। मिलकर महिमा हरि का गाओ।।
अब सत्य मार्ग नित दिखलाओ। भव सागर से जन तर जाओ।
सबका हृदय भरे रस पावन । जैसे खुशियों का हो सावन।।
चलते-फिरते सांँसें आती। बुझ जाती जीवन की बाती।
हर पल थोड़ा समय निकालो। भव बंधन से मुक्त करा लो।।
जीवन क्षणभर का है मेला। जाना सबको एक अकेला।
अब तो राह सुधारो भाई। अंतस बैठे प्रभु रघुराई।।
जीवन में मत बन अभिमानी। भ्रम का जाल हटा लें ज्ञानी।।
कुछ तो सोच समझ ले प्राणी। बोलो भाव भरे मृदुवाणी।
परमात्मा का सुंदर आकृति। संस्कार सृजन की संस्कृति स्मृति।
जग में सदा अमर वह प्राणी। बोले सत्य मधुर शुभ वाणी।।
धर्मेंद्र कुमार श्रवण शिक्षाश्री
बालोद छत्तीसगढ़
