DAILY BALOD NEWS

EDITOR IN CHIEF – DEEPAK YADAV.9755235270

Advertisement

वेदांश की पुकार

अनन्त नभ में गुंजित होती, वेद-वाणी की दिव्य पुकार।
जिससे जग उठी चेतना, हिल उठा मृत्तिका का भार।।

पवन लहरियों में निहित स्वर, जो गूँजे मुनियों के कान।
स्वयं के भीतर झाँक सके जो, वही जाने उसका गान।।

छंदों की लय में बंधे हुए, ब्रह्म के गूढ़ रहस्य अनेक।
हर ऋचा में बसे हुए है, ज्ञान का अमृत विवेक।।

यज्ञ अग्नि के ताप से जलते, कर्म और संकल्प यहाँ।
द्रवित हृदय में उठते श्लोक, बनते मोक्ष के मार्ग वहाँ।।

आलोकमय वह ज्ञान स्रोत, जो अज्ञान तमस को हरता है।
वेद प्राण में सदा विराजे, जो जीवन को सत्य करता है।।

वाणी बनती वायु में रचती, सूक्ष्म स्वर का ब्रह्म विस्तार।
प्रत्येक अक्षर एक प्रतीक है, चेतन सृष्टि का उद्घार।।

मानव की सीमा, देवों का गान, अव्यक्त स्वर का सतत विधान।
वेद वही जो भीतर बोले, और मिटाए भ्रम का धुंध स्थान।।

अमृत शब्दों की इस गंगा में, डूबे जो, वो तृप्त हुआ।
ज्ञान नायक बना अनश्वर, परम पुंज में लीन हुआ।।

           परमानंद निषाद 'प्रिय'
                निठोरा, सोनाखान

You cannot copy content of this page