आज भी जलते हैं यहां आस्था के जोत, अंग्रेज कलेक्टर ने यहां के चमत्कारों को देख दिया था ताम्रपत्र
गुरूर-(दीपक देवदास की विशेष रिपोर्ट)
नवरात्रि के अष्टमी के अवसर पर हम गुरुर ब्लॉक के बहुचर्चित मां कंकालिन धाम कनेरी की कहानी लेकर आए हैं। जहां वर्तमान में आस्था के रूप में 480 तेल और 36 घी के जोत जल रहे हैं। अष्टमी पर यहां दोपहर 2 बजे हवन पूजन और भंडारा का कार्यक्रम रखा गया है। साथ में कन्या भोज भी होगा। भंडारे में करीब 7000 लोग प्रसाद ग्रहण करने आते हैं। कनेरी के इस मां काली मंदिर का अस्तित्व अभी से नहीं बल्कि अंग्रेज शासन काल से है। लगभग 156 साल पहले 1869 में एक कुटिया के रूप में माता के मंदिर की शुरुआत हुई, इसके पीछे किवदंती है कि गांव में एक बैठक चल रही थी, इस बीच गांव के बैगा स्व. फोटकहा राम पर देवी सवार हो गई। देवी के रूप बैगा कहने लगा कि मैं कंकालिन हूं, हम तीन बहने दूरस्थ वनांचल से आ रहे हैं। एक बहन कोलकाता में रुकी है एक बहन रायपुर में और मैं यही विराजित होना चाहती हूं। मुझे रोक सको तो रोक लो। बैगा की इस तरह देवी सवार होकर जो बातें कही जा रही थी, उसे आस्था और माता का चमत्कार मानते हुए लोग बैगा के पीछे पीछे जंगल की ओर चल पड़े और एक जगह पहुंचकर बैगा, देवी की भाषा में ही बताने लगा कि वह कहां पर विराजित होना चाहती हैं। जिस स्थान पर वर्तमान में मंदिर है, वहां पहले घना जंगल हुआ करता था । वहां जाकर बैगा रुका और माता को वही विराजित करने की बात कही। एक पत्थर रूपी प्रतिमा के साथ कुटिया बनाकर 1869 में लोगों ने आस्था की जोत जलाई और मां कंकालीन की पूजा अर्चना शुरू की लगातार 156 वर्षों से आस्था यहां दिनों दिन बढ़ती जा रही । स्थानीय ग्रामीण ही नहीं गुरुर, धमतरी और अन्य जिले को लोग भी यहां अपना मनोकामना लेकर जोत जलाते हैं। खासकर निसंतान दंपत्ति यहां जोत जलवाने के लिए आते हैं। कई लोगों की मनोकामना भी पूरी हुई है।
अंग्रेज कलेक्टर ने दिया था ताम्र पत्र
मंदिर समिति के अध्यक्ष जनार्दन सिन्हा ने बताया कि पूर्वजों से एक बात यह भी सुनते आए हैं कि जब अंग्रेज शासन काल था तो अंग्रेजों ने भी माता के चमत्कार को परखने की कोशिश की इस बीच यहां का तत्कालीन बैगा डंगनी लेकर दुर्ग जिला कलेक्टर तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी के पास गए और वहां अंग्रेज कलेक्टर ने बैगा की परीक्षा लेनी चाही। माता के चमत्कार से बैगा ने बता दिया कि कद्दू के भीतर कितने बीज हैं, बकरी के गर्भ में कितने बच्चे, नर और मादा पल रहे हैं, इस तरह के चमत्कार को देख अंग्रेज कलेक्टर हैरान रह गए। उन्होंने माता को चमत्कारिक मान मान्यता देते हुए ताम्रपत्र में एक प्रमाण पत्र भी दिया। इसके बाद अंग्रेज शासन काल से ही इस जगह की महत्ता दिनों दिन बढ़ने लगी। आजादी के बाद तो मानो लोगों ने इस मंदिर के विकास को लेकर काफी योगदान दिया। वर्तमान में मंदिर परिसर में भव्य पंचमुखी हनुमान की मूर्ति भी स्थापित है। तो वहीं आसपास सुंदर गार्डन भी तैयार किए गए हैं। मां कंकालीन का भी मंदिर भव्य बना हुआ है।

अंदर राजा राव और बईहा राजा की प्रतीकात्मक मूर्तियां घोड़े पर सवार विराजी की गई है। आदिवासी समाज के देवताओं के प्रति भी लोग आस्था रखते हैं और मां कंकालिन के साथ उनकी भी पूजा अर्चना होती है। दानदाताओं की मदद से मंदिर स्थल को विकसित करने का प्रयास यहां के लोग कर रहे हैं। तालाब में सुंदरीकरण का काम भी जारी है। मंदिर समिति में अध्यक्ष जनार्दन सिन्हा सहित कोषाध्यक्ष राम ईश्वर यादव, उपाध्यक्ष मोहन सिन्हा ,देवेंद्र यादव ,अमित यादव, पन्ना सिन्हा ,सचिव हरिश्चंद्र साहू, महेश सिन्हा ,द्वारिका यादव, सादिक अली सहित अन्य जुड़े हुए हैं।

कुछ मदद सरकार से तो कुछ जन सहयोग से हो रहे निर्माण, पर्यटन स्थल बनाने की मांग
मंदिर समिति अध्यक्ष जनार्दन सिन्हा ने कहा कि कंकालिन मंदिर कनेरी को धार्मिक पर्यटन स्थल बनानस की मांग लंबे समय से की जा रही है। इस क्रम में शासन प्रशासन द्वारा कुछ कार्यों के लिए सहयोग करते हुए शासन से स्वीकृति भी मिली है। जिसके तहत पूर्व में बाउंड्री वॉल, कार्यालय भवन, सामुदायिक भवन और रंगमंच के लिए राशि मिली है। तो अन्य मूर्तियों जैसे पंचमुखी हनुमान और अन्य मंदिर, मूर्तियों को ग्राम और आम जनता के सहयोग से ही बनाए गए हैं। मंदिर के बगल में आदिवासी समाज का बूढ़ादेव मंदिर और विश्वकर्मा समाज का विश्वकर्मा मंदिर भी है। परिसर में स्थित कंकालिन तालाब के बीचों-बीच विष्णु की भव्य मूर्ति स्थापित हो रही है। तो वही भविष्य में इस तालाब में बोटिंग की सुविधा भी दी जाएगी।
