नहीं मनाते इस गांव में दशहरा, नवमी पर होता है देव दशहरा का आयोजन
बालोद (कंटेंट दीपक यादव, फोटो : पंकज जैन अरजपुरी से)

नवरात्रि के सातवें दिन हम डौंडीलोहारा ब्लॉक के वनांचल में स्थित गांव अरजपुरी के दंतेश्वरी माता की ऐतिहासिक कहानी लेकर आए हैं। यहां की दंतेश्वरी माता को ग्रामीण “थाना वाली देवी” के नाम से जानते हैं. थाना वाली देवी के कहने का कारण ग्रामीण बताते हैं कि यह देवी आसपास के 12 गांव के देवी देवताओं के लिए प्रमुख स्थल है ग्रामीणों ने बताया कि आसपास के 12 गांव में कोई भी देव काम शुरू करते हैं तो वहां के बैगा पूजा पाठ करते समय सबसे पहले अरजपुरहीन दाई दंतेश्वरी को याद करते हैं। उनके नाम से हुम देते हैं। उसके बाद ही वे अपने गांव की देव की पूजा करते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि 12 गांव का क्षेत्र मानपुर मोहला जिला के कुछ गांव तक भी फैला हुआ है। अरजपुरी का गांव वैसे तो यहां से 14 किलोमीटर दूर मंगचुआ थाना अंतर्गत आता है। पर देवी देवताओं के लिए अरजपुरी का दंतेश्वरी देवी अपने आप में एक थाना माना जाता है। जहां पर नवरात्र में 87 जोत श्रद्धालुओं द्वारा जलाए गए हैं। स्थानीय ग्रामीणों के अलावा रायपुर, बिलासपुर तक के श्रद्धालु भी यहां अपनी आस्था जताते हैं। एक और खास बात यह है कि यहां के ग्रामीण अन्य गांव की तरह दशहरा नहीं मनाते। रावण का पुतला दहन नहीं करते बल्कि यहां क्वांर नवरात्रि के नवमी पर देव दशहरा का आयोजन होता है। जिसमें गांव के सभी देवी देवताओं की डांग डोरी के साथ पूजा अर्चना की जाती है।
भंगा राव को मानते हैं मंदिर का चौकीदार

दंतेश्वरी मंदिर में जैसे ही प्रवेश करते हैं बाहर में ही चौकीदार की तरह भंगा राव की घोड़े पर सवार एक मूर्ति है। इसे गांव के लोग दंतेश्वरी थाना वाली देवी का चौकीदार मानते हैं। मान्यता है कि जब भी कोई दुखी व्यक्ति यहां आते हैं तो सबसे पहले भंगा राव के चरण स्पर्श करते हैं और वे अनुमति स्वीकार करते हैं तब लोग मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं। जिस तरह थाने में सामने कोई चौकीदार या सिपाही तैनात होते हैं इसी तरह इस थाना वाली देवी के मंदिर में भंगा राव जिसे छड़ी दार भी कहते हैं, रक्षा के साथ-साथ आने वाले श्रद्धालुओं की प्रवेश की अनुमति देने स्वरूप तैनात रहते हैं। साथ ही लोग मानते हैं कि भंगा राव बाहरी बुरी शक्तियों से गांव और ग्रामीणों की रक्षा करते हैं।
क्यों नाम पड़ा “थाना वाली देवी”
गांव के दरबारी राम भूआर्य ने बताया कि अरजपुरी के मां दंतेश्वरी पर 12 गांव की जिम्मेदारी है। इन 12 गांव में कहीं भी कोई पूजा या देव कार्य होते हैं तो सबसे पहले अरजपुरी की माता को स्मरण किया जाता है, एक तरह से उनकी अनुमति ली जाती है। जिस तरह थाने में थाना प्रभारी से किसी आयोजन को लेकर अनुमति ली जाती है उसी तरह इस दंतेश्वरी मंदिर को 12 गांव के लोग मानते हैं। इसलिए इसे “थाना वाली देवी” कहा जाता है। यह नाम पूर्वजों से चला रहा है। पुराना तालाब शीतला मंदिर के अंदर मां दंतेश्वरी विराजित है। लगभग 10 साल पहले ग्रामीणों ने आपस में चंदा करके नया मंदिर बनवाया है। पहले मिट्टी का खपरैल वाला मंदिर हुआ करता था।
डोंगरी वाली पाठ में जाकर करते हैं पूजा अर्चना
ग्रामीण गणेश राम रात्रे, कमल बन स्वामी ने बताया कि देव दशहरा के दिन सभी ग्रामीण और मंदिर समिति के लोग डांग डोरी के रूप में डोंगरी वाली पाठ में जाते हैं। जहां झाड़ में रैनी पूजा करते हैं। पान फूल अर्पित करते हैं। जिसमें नारियल, पान, सुपारी, ध्वजा, नींबू देव को चढ़ाते हैं। यहां कई देवी देवताओं का वास माना जाता है। उक्त बैरागी डोंगरी में नदी के किनारे लोग जाते हैं और वहां डांग डोरी का नया सृजन करते हैं और फिर उन्हें मंदिर वापस लाते हुए देव दशहरा संपन्न कराया जाता है । यहां बलि प्रथा वर्जित है। किसी भी तरह से मंदिर में बकरा आदि की बलि नहीं दी जाती है। 12 गांव की प्रमुख देवी होने के कारण यहां के दंतेश्वरी को बरगहीन भी कहते हैं।
पूर्वजों से चली आ रही परंपरा कायम इसलिए नहीं मानते दशहरा
ग्रामीण झाडू राम खरे, झाड़ू बन गोस्वामी ने बताया कि पूर्वजों से यहां देव दशहरा होता है। इसलिए जो सामान्य गांव में दशहरा मनाते हैं, रामलीला होती है रावण का पुतला बनाकर दहन करते हैं, ऐसा कुछ इस गांव में आज तक नहीं हुआ है, ना कभी आगे होगा। पूर्वजों की बनाई परंपरा को कायम रखते हुए आज की पीढ़ी भी इसे बरकरार रखी हुई है। दशहरा के दिन यहां कोई आयोजन नहीं होता।
