भगवान को सत्कर्मों का वचन देकर हाथ जोड़े दुनिया में आते हैं लोग, पर जीवन भर वचन नहीं निभाते: राजा महराज

बालोद । गुण्डरदेही ब्लॉक के ग्राम तवेरा में यदु परिवार सहित समस्त ग्रामवासियों के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ सप्ताह में भागवत आचार्य पंडित राजा महाराज पाण्डेय निवासी ग्राम खुर्सीपार ने विभिन्न कथा प्रसंग के माध्यम से ग्रामीणों को भाव भक्ति से जोड़ रहे हैं। उन्होंने कथा प्रसंग के दौरान कपिल जन्म, माता अनसूईया की कथा, ध्रुव चरित्र, जड़ भरत कथा आदि बताई। विभिन्न कथा प्रसंग के बीच-बीच में उन्होंने उदाहरण के जरिए मनुष्य के जीवन में भगवान के महत्व और भक्ति के बारे में विस्तार से बातें कही। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जन्म बहुत मुश्किल से मिलता है। जब मनुष्य इस संसार में एक शिशु के रूप में जन्म लेता है तो उसकी मुट्ठी बंधी होती है। मुट्ठी बंद होना एक तरह से संकल्प/ वचन का प्रतीक माना जाता है कि जब पांचवे महीने में किसी भी माता के गर्भ में पल रहे शिशु में जीव का प्रवेश होता है और जब आठवें नौवें महीने आते तक वह जीव गर्भ में कई परेशानियों से जूझता है तो वहां से मुक्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करता है। भगवान उन्हें इसी शर्त पर वचन दिलाते हैं कि दुनिया में जाओगे तो भगवान की भक्ति करोगे, सत्कर्म करोगे तभी तुम्हें गर्भ से मुक्ति मिलेगी। शिशु रूपी मानव भगवान को वचन देते हैं और यही प्रतीक है कि जब वह जन्म लेते हैं तो उनकी मुट्ठी बंद होती है और जब संसार से विदा होते हैं तो मनुष्य की मुट्ठी खुली रहती है। उन्होंने उदाहरण के जरिए समझाया कि कुछ लोग अपने लोभ और लालच की वजह से भगवत भक्ति से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस संसार में आने से पहले शिशु रूपी मनुष्य भगवान को उनकी भक्ति का वचन तो देते हैं लेकिन बचपन, युवावस्था, जवानी और बुढ़ापा बीतने को आ जाता है पर भाव भक्ति में कोई ध्यान नहीं देते। वह अपने वचनों को निभाते नहीं है। ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें अपनी नित्य कर्मों के साथ-साथ ईश्वर भक्ति की ओर भी ध्यान देना चाहिए। तभी इस संसार रूपी मोह माया के जाल से मुक्त हो सकते हैं। उन्होंने लोभ और लालच के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। उन्होंने कथा प्रसंग के दौरान व्यंग्य उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि आजकल मैचिंग का जमाना है। पर हमें आत्मा और परमात्मा में मैचिंग करना सीखना है, ना कि चेहरे और कपड़ों का। यह चेहरा हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आपका अगर मन या आत्मा ही सुंदर नहीं है तो चेहरा कोई काम का नहीं है। इसलिए अपने शरीर को नहीं आत्मा को सुंदर बनाने पर काम कीजिए तभी आपका परमात्मा से मिलन हो सकता है।
भागवत कथा के अनुसार, जब बच्चा जीवन में आता है, तो वह हाथ जोड़कर आता है, क्योंकि वह भगवान की कृपा से, एक नए जन्म के रूप में, संसार में प्रवेश करता है और अपने कर्मों के अनुसार जीवन जीता है. बच्चा एक नई शुरुआत का प्रतीक है, जो भगवान की कृपा से संसार में प्रवेश करता है. बच्चे का हाथ जोड़कर आना, भक्ति और समर्पण का भी प्रतीक है, जो भगवान के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है. बच्चा अपने पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार जीवन में प्रवेश करता है, और उसके जीवन में होने वाले सुख-दुख उसके कर्मों का फल होते हैं। बच्चे को ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करने के लिए संसार में भेजा जाता है, ताकि वह अपने जीवन को सार्थक बना सके। समस्त ग्रामीण/पालकों को अपने बच्चों को संस्कारी बनाने की अपील भी की। इस दौरान आयोजकों में प्रमुख रूप से पवन कुमार यदु, कलिंद्री, उत्तम कुमार, गिरीश, खुमान सिंह, गैंदी, हेमलाल, मुन्नी, मिथलेश, लता, सुलोचना, सुशीला, आकाश, श्रद्धा, जीवनलाल, मालती, श्रवण, कौशल सहित अन्य मौजूद रहे।