बालोद। महाशिवरात्रि के अवसर पर बालोद जिले के ग्राम जगन्नाथपुर में स्थित 11वीं शताब्दी के प्राचीन शिव मंदिर में विशेष पूजन अर्चन का कार्यक्रम हर साल की भांति इस वर्ष भी संपन्न हुआ। इस बार यहां बन रहे 33 फीट महादेव की मूर्ति को देखने के लिए भी स्थानीयतग्रामीण सहित दूर-दूर के श्रद्धालु जन भी कार्यक्रम में पहुंचे हुए थे। आस्था के सैलाब के बीच ओम नमः शिवाय और विधिवत मंत्र उच्चारण के साथ 11वीं शताब्दी के शिवलिंग का अभिषेक किया गया। साथ ही समस्त श्रद्धालुओं को योगेश्वर देशमुख की ओर से खीर पूड़ी का प्रसाद वितरित किया गया। उक्त मंदिर बालोद से अर्जुंदा मुख्य मार्ग पर घुमका के बाद गांव के प्रवेश स्थल पर ही है। महाशिवरात्रि के दिन पड़ोसी ग्राम कमरौद में दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर परिसर में मेला लगता है । जहां जाने वाले श्रद्धालुओं का सिलसिला सुबह से जारी था। रास्ते में पड़ने वाले जगन्नाथपुर के इस प्राचीन शिव मंदिर का दर्शन करने के लिए श्रद्धालु जन देर शाम तक आते रहे। तो वही सुबह से पंडित भेष कुमार दुबे के मंत्र उच्चारण के साथ यहां विभिन्न अभिषेक और विशेष पूजन का कार्यक्रम संपन्न हुआ। आयोजन में प्रमुख रूप से निवर्तमान सरपंच
अरुण साहू, सोनी साहू, लोकेंद्र देशमुख, टुकेश्वर, नोखे पटेल, दानी देशमुख, मालती ठाकुर, ईश्वरी साहू, सुशील देशमुख, कमला, मुकेश देशमुख, सोनू सलीम साहू, भीषम देशमुख, चिंटू देशमुख, एवन विश्वकर्मा, दीपक यादव आदि का योगदान रहा। नवनिर्वाचित सरपंच देव कुंवर कोशिमा भी इस महाशिवरात्रि पूजन में शामिल हुई। ज्ञात हो कि वर्तमान में यहां बन रहे 33 फीट के ऊंचे महादेव की प्रतिमा आकर्षण का केंद्र बना है। जिससे अब इस गांव को बालोद जिला सहित पूरे राज्य में एक नई पहचान मिलने जा रही है। प्राचीन शिव मंदिर और बांध के तट पर सौंदर्यीकरण के साथ-साथ 33 फीट ऊंचे महादेव की प्रतिमा निर्माण का कार्य जारी है। जिससे बालोद जिले के पर्यटन के नक्शे पर जगन्नाथपुर उभरेगा। वर्तमान भाजपा सरकार जहां पर्यटन को उद्योग का दर्जा देकर राज्य के पर्यटन स्थलों को बढ़ावा देने का प्रयास कर ही है।

इस क्रम में जगन्नाथपुर के उक्त स्थल को पर्यटन के रूप में बढ़ावा देने के लिए जिला प्रशासन से भी ग्रामीणों और पंचायत प्रतिनिधियों की कई अपेक्षाएं हैं। हाल ही में जिला प्रशासन की पहल से यहां बोटिंग की सुविधा के लिए चार बोट उपलब्ध कराए गए हैं। यह खेद का भी विषय है कि यहां का 11वीं शताब्दी का प्राचीन शिव मंदिर पुरातत्व विभाग के तहत संरक्षित स्थल है। बावजूद यहां विभाग की ओर से आज तक कोई संरक्षण के कार्य नहीं कराए गए। जो भी कार्य स्थानीय सरपंच, ग्राम वासियों और दानदाताओं की मदद से ही होते आए हैं। महाशिवरात्रि पर प्राचीन शिव मंदिर में विशेष पूजा अर्चना में नवदंपति यहां कुशल मंगल गृहस्थ जीवन की कामना के साथ विशेष रूप से शामिल होते हैं। श्रद्धालुओं के लिए खीर पूड़ी प्रसाद का वितरण किया जाता है। निवर्तमान सरपंच अरुण साहू ने बताया कि जल्द ही इस बांध में बोटिंग की शुरुआत भी होने वाली है। जिला प्रशासन की ओर से हमें चार बोट मिले हैं। जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह चंद्रवाल और जिला पंचायत सीईओ संजय कन्नौजे की पहल से यहां जल्द ही बोटिंग की सौगात ग्रामीणों को मिलने वाली है। समय-समय पर जिला और जनपद प्रशासन का सहयोग मिलता आया है। इस स्थल को और बेहतर तरीके से विकसित करने के लिए हम चाहते हैं कि स्वयं जिला प्रशासन की ओर से कलेक्टर या अन्य अधिकारी यहां आए और इस स्थल का जायजा लेकर अन्य पर्यटन की संभावनाओं पर काम हो सके। नौकाचालन का नवनिर्वाचित सरपंच के पदभार ग्रहण करने के साथ विधिवत इसका शुभारंभ करवाया जाएगा। अभी कुछ काम शेष हैं। बोटिंग के लिए मछुआ समिति या पंचायत को अधिकृत जिम्मेदारी देकर उसके रखरखाव और सशुल्क इसकी पर्यटकों को सुविधा देने की योजना है। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन एक बार इस जगह पर आकर देखें तो इस जगह का और बेहतर तरीके से उद्धार किया जा सकता है।महादेव की मूर्ति निर्माण में लगभग 9 लाख रुपए अब तक खर्च हो चुके हैं। आप को यह भी बताना चाहेंगे कि 11वीं शताब्दी के उक्त प्राचीन व ऐतिहासिक मंदिर की अपनी पौराणिक मान्यता तो है ही, ऐतिहासिक महत्व भी है। इस मंदिर निर्माण से गांव का नाम भी जुड़ा हुआ है। पुरी के जगन्नाथ से प्रेरित होकर गांव का नाम जगन्नाथपुर पड़ा है। बालोद अर्जुन्दा मार्ग पर स्थित गांव की सीमा पर यह प्राचीन शिव मंदिर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है। इसकी महत्ता से अधिकतर लोग अनजान है तो वही कहानी से भी। हमने इस मंदिर के ऐतिहासिक महत्व के बारे में जानकारी ली तो यह रोचक तथ्य सामने आया कि गांव का नाम ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा है। इसके पीछे जगदलपुर के राजा का भक्ति भाव और मंदिर निर्माण का प्रयास बताया जाता है। बुजुर्गों से सुनी आ रही किवंदती अनुसार ऐसी मान्यता है कि जगदलपुर के राजा-रानी ओडिशा के जगन्नाथ मन्दिर की यात्रा में गए थे। वहां से लौटते समय तत्कालीन ग्राम डुआ (वर्तमान नाम जगन्नाथपुर) में विश्राम के लिए रुके थे। यहां का माहौल पुरी की भांति भक्ति पूर्ण रहता था, जिसे देखते हुए राजा रानी के द्वारा यहां पर दो शिवलिंग मंदिर का निर्माण किया गया। जिसमें एक मंदिर नष्ट हो चुका है और एक अस्तित्व में हैं। यहां स्थित सुदर्शन चक्र नाम का पत्थर भी विशेष कौतूहल का विषय है। आने वाले दिनों में “जगन्नाथपुरम” के नाम से ट्रस्ट बनाकर इस मंदिर और आसपास के सुंदरीकरण सहित विभिन्न विकास कार्यों को गति देने के लिए जगन्नाथपुर सहित अन्य गांवों और बालोद शहर के दानदाताओं को जोड़ने की भी योजना है।
