कहने को हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था में हैं लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम लोकतंत्र के भ्रम में हैं। वर्तमान समय में परिवार वाद के कारण लोकतंत्रिक प्रणाली केन्द्रीकृत होती जा रही है।आजादी के कुछ वर्षों बाद ही राजनीति में परिवारवाद का बीजारोपण हो गया था जो वर्तमान समय में भी अधिकतर राजनैतिक दलों में व्याप्त है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी परिवारवाद और भी मजबूत होती जा रही है।यह लोकतंत्र पर आघात है।राजनीति में परिवार वाद का विरोध भी हुआ लेकिन धीरे-धीरे वे लोग वे लोग भी परिवारवाद अपनाने लगे जो परिवार वाद के विरोधी थे। परिवार वाद का प्रभाव निचले स्तर की राजनीति में भी है।परिवारवाद, वंशवाद व राजशाही का घालमेल लोकतंत्र को प्रभावित करता है। इसी कारण लोगों का राजनीतिक व्यवस्था से विश्वास उठते जा रहा है। एक आंकड़े के अनुसार देश की पूरी आबादी पर सिर्फ 200 परिवार राज करते हैं, जो राजतंत्र की याद दिलाते हैं। यह राजनीति का त्रासद पक्ष है। राजनीतिक शुचिता में बाधक है और यही लोकतंत्र से भरोसा उठने का मूल कारण भी है।आम जनता परिवारवादी दलों की बढ़ती संख्या से निराश है। वह ठगा महसूस करता है। प्रभुता व सामन्तवादी सोच भी लोकतंत्र को बाधित करता है। सामन्तवादी सोच आज भी कायम है। विचार और सिद्धांत के आधार पर पार्टीयां बनना और चलना मुश्किल हो गया है।राजनीति में परिवार वाद, धर्म व जाति का सहारा लेने से गणतंत्र की व्यवस्था प्रभावित होता है। राजनैतिक दलों का मुख्य कार्य राष्ट्रहित का संवर्धन है लेकिन धर्म जाति व परिवारवाद के कारण राष्ट्रहित के मुद्दे गौण हो जाते हैं। राजनीति को व्यापक परिपेक्ष्य में देखने का संस्कार हो तो राष्ट्रहित स्वाभाविक है। राजनीति में व्यापक सुधार की जरुरत है। देश को जातिवादी वंशवादी और परिवारवादी
राजनीति से छुटकारा दिलाने की है। परिवार वाद के कारण जन सामान्य का बहुत बड़ा वर्ग राजनीतिक दृष्टि से वंचित हो जाता है। इनके उत्थान व देश के विकास को महत्व देना होगा। जातिवाद व परिवार वाद के कारण लोकतंत्र दूषित होता है। यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। जब तक निम्न मध्यवर्गीय वर्ग का व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में शीर्ष स्थान पर नहीं पहुंचता तब तक पूर्ण लोकतंत्र आना मुश्किल है। योग्यता,निजी मौलिकता व नेतृत्व क्षमता के अभाव में परिवार वाद के सहारे लोग शीर्ष पदों पर काबिज हो जाते हैं। लोकतंत्र में परिवार वाद नई प्रतिभाओं को आगे आने में भी बाधक है। परिवार वाद के कारण निष्ठावान व प्रतिभाशाली लोगों को अवसर भी नहीं मिल पाता। निष्ठावान व प्रतिभाशाली लोगों की उपेक्षा भी सम्भव है। सत्ता में भागीदारी के लिए सभी को अवसर मिलना चाहिए। सत्ता का विकेन्द्रीकरण, सामाजिक लोकतंत्र को मजबूत करने, जातिवाद व परिवारवाद को दूर कर ही लोकतंत्र को मजबूत बनाया जा सकता है।सत्ता का विकेन्द्रीकरण व समाज की सभी इकाईयाँ मजबूत होंगी तभी हम सार्थक गणतंत्र की ओर बढ़ सकेंगे। परिवार वाद के कारण राजनैतिक व्यवस्था का सूत्र कुछ लोगों के हाथों में आता है। परिवार वाद रहते पूर्ण लोक तान्त्रिक व्यवस्था की परिकल्पना का साकार होना अभी शेष है। परिवार वाद का सहारा लेकर जो व्यवस्था परिचालित है उसे स्वस्थ लोकतंत्र के स्वरूप के लिए ठीक नहीं कही जा सकती। परिवारवाद गणतंत्र की व्यवस्था को हानि पहुँचाता है। ऐसी विसंगत व्यवस्थाओं के कारण ही संविधान विरोधी तत्व पनपते हैं।
अतः लोकतंत्र के स्वास्थ्य व भविष्य के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए। चिन्तन यह करना चाहिए कि लोकतंत्र कैसे परिष्कृत बने। परिवार वाद के कारण जन सामान्य का बहुत बड़ा वर्ग राजनीतिक दृष्टि से वंचित हो जाता है।इस प्रकार वंचित व शोषित जनसमाज राजनैतिक दृष्टि से पिछड़ जाता है। सत्ता का विकेन्द्रीकरण व सामाजिक लोकतंत्र को मजबूत करने से परिवारवाद किसी राजनैतिक लाभ का साधन नहीं बन सकता। देश, समाज व लोकातंत्र के हित में ऐसी विसंगत व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए बहुत कुछ किया जाना अभी शेष है। लोकतंत्र के प्रति जनता के विश्वास को बनाए रखा जाए। राजनैतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोक तान्त्रिक मूल्यों के आधार पर राजनीति को उच्च आदर्शों पर कसा जाना अभी शेष है। लोकतंत्र को जीव॓त व मजबूत बनाये रखने में सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ प्रबुद्ध नागरिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है जिसका प्रभावपूर्ण नेतृत्व जनता की चेतना जागृत कर दिशा देता है। राष्ट्रनिष्ठ राजनैतिक दलों से ही सशक्त व आदर्श लोकतंत्र का विकास होगा। राजनीति का स्तर ऊँचा होना चाहिए। देश का भविष्य मतदाताओं पर निर्भर करता है।मतदाता के नैतिक दायित्व, विवेकपूर्ण व परिष्कृत दृष्टिकोण से ही वंशवाद व परिवारवाद से मुक्त होकर सार्थक गणतंत्र की ओर बढ़ सकते हैं।
उक्त बातें लेख के रूप में लेखक बिजेंद्र सिन्हा दुर्ग के निजी विचार हैं।
