बालोद राज शासन क्षेत्र में इस गांव के नाम से प्रचलित था हाना ,लोग कहते थे: पिरिद, पापरा, डुआ, सांकरा, बहुते दूर कमरउद,,, रानी के पद राखे, हीरापुर, बलउद..




(कंटेंट- माधुरी दीपक यादव, फोटो- मुकेश सेन) बालोद। आज समूचे भारत अंचल में रथ दूज का पर्व मनाया जा रहा है। इस पर्व पर जहां ओडिशा के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पुरी में विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ की रथ यात्रा निकल रही है। तो वही गांव से लेकर शहरों तक भी रथ यात्रा का आयोजन होता है। बालोद जिले में एक ऐसा भी गांव है जिसके नामकरण के पीछे पुरी के धाम जगन्नाथ मंदिर और बस्तर के जगदलपुर की कड़ी जुड़ी है। इस गांव में ना कोई जगन्नाथ जी का मंदिर है , ना कोई रथ यात्रा निकलती है फिर भी इसके नामकरण के पीछे जगन्नाथ धाम की कहानी है आइये जानिये आखिर क्यों इसका नाम जगन्नाथपुर पड़ा है। यह गांव जगन्नाथ मंदिर के बजाय शिव मंदिर के कारण जाना जाता है ।जो पुरातात्विक है और उसे शासन द्वारा राज्य संरक्षित स्मारक भी घोषित किया गया है। 600 साल पहले कभी डूआ के नाम से जाना जाने वाले इस गांव का नाम जगन्नाथपुर का नाम भी खास तरीके से ही पड़ा है। यहां के प्राकृतिक मनोरम दृश्य को देखकर जगदलपुर के राजा रानी ने इस गांव का नाम जगन्नाथपुर रखा था। यहां सैकड़ों एकड़ क्षेत्र में फैले बांध, जो पहले समुद्र की तरह नजर आता था और उसी के किनारे स्थित पुरातात्विक मंदिर, यह सभी दृश्य पुरी के जगन्नाथ धाम के समान लगते थे। इसलिए शायद उस समय राजा रानी ने इस गांव का नाम ही बदल दिया। जो आज तक अब इसी नाम से इसकी पहचान है। जगन्नाथपुर बालोद से लगभग 12 किमी दूर अर्जुंदा मार्ग पर स्थित है। इस गांव की खास पहचान यहां के प्राचीन शिव मंदिर व अन्य रहस्यात्मक पत्थरों से है। जिनके बारे में अभी भी पुरातत्वविदों को शोध की जरूरत है।

जगन्नाथ धाम पुरी से दर्शन कर लौट रहे थे राजा रानी, ठहरे थे फिर डूआ में


इसे डुआ से जगन्नाथपुर बनाने का श्रेय जगदलपुर के राजा-रानी को जाता है। जो पुरी (ओडिशा) से भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर लौट रहे थे। तब यहां विश्राम के लिए रुके थे और यहां के माहौल, वातावरण को देखकर उन्होंने इस गांव का नाम जगन्नाथपुर रखा था। तब से यही नाम चला आ रहा है। अपने बुजुर्गों से सुनी बातों के अनुसार कोमल देशमुख वरिष्ठ ग्रामीण का कहना है कि बस्तर महाराजा पुरुषोत्तम देव 1408 में भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने पुरी गए थे।वहीं वापसी में हमारे गांव से भी गुजरे थे। जिनके द्वारा फिर गांव का नामकरण हुआ। रानी का नाम कंचनकुवरि बघेलिन था ।

100 एकड़ में फैला है बांध

जनपद सदस्य छगन देशमुख, दीपक यादव ने बताया कि बुजुर्गों से सुनी बातों के अनुसार मंदिर बनाते समय उसी जगह पर एक बड़े तालाब का भी निर्माण 11वीं शताब्दी में किया गया था। उसके बाद 1972 में लगभग 100 एकड़ भूमि पर इसी तालाब से लगा बांध बनवाया गया। यह मंदिर आसपास के गांव में प्रतिष्ठित पौराणिक व एक प्राचीन मंदिर के रूप में जाना जाता हैं पर पुरातत्व विभाग की अनदेखी की वजह से अस्तित्व भी खो रहा है।

राजा-रानी के निर्देश पर की गई शिवलिंग की स्थापना

राजा रानी के निर्देश के बाद बंजारों व स्थानीय ग्रामीणों के जरिए यहां मंदिर बनाकर शिवलिंग की स्थापना की गई थी। इसके अलावा गणेश व अन्य मूर्तियां भी हैं जो प्राचीन हैं। कुछ रहस्यात्मक पत्थर भी हैं। जिन्हें स्थानीय लोग सुदर्शन पत्थर बोलते हैं। जिसे सहेज कर रखा गया है। उस समय दो मंदिर बने थे। माना जाता है कि आज जो एक मंदिर बचा हुआ है उस मंदिर पर नाग नागिन का जोड़ा भी विचरण करते हैं। नेवला और सांप एक साथ यहां रहते हैं।

एक हाना था उस दौर में प्रचलित

वही शिव मंदिर के निर्माण को लेकर ग्रामीण बुजुर्ग विषय लाल उर्फ केशव पटेल बताते हैं कि इसका निर्माण द्वापर युग में हुआ है, ऐसा हम बुजुर्गों से सुनते आए हैं। उस समय छमाही रात, छमाही दिन का दौर होता था। उन्होंने डुआ नाम के पीछे एक हाना भी प्रचलित होने की बात कही. उन्होंने कहा वह हाना था – पिरिद, पापरा, डुआ, सांकरा, बहुते दूर कमरउद,,, रानी के पद राखे, हीरापुर, बलउद.. जिसका अर्थ था इन इलाकों तक बालोद के राजा का शासन था, कमरउद यानि वर्तमान कमरौद ग्राम दुर्ग राज में आता था. उक्त हाना में शामिल डुआ ही आज का जगन्नाथपुर है.

सरपंच, दानदाताओं के सहयोग से बनवा रहे विशाल शिव शंकर का मंदिर, बनेगी मूर्ति,,,,,,

गांव के बांध के दूसरे छोर पर सरपंच अरुण साहू द्वारा पंचायत प्रशासन, जनपद प्रशासन और दानदाताओं के सहयोग से विशाल शिव शंकर की मूर्ति स्थापना करवा रहे हैं। जिसके चबूतरा निर्माण पूर्ण हो चुका है। साथ ही आसपास सुंदरीकरण का कार्य भी जारी है। यहां पर 16 खंभों पर मशाल भी जलाया जाएगा। जो इस जगह को और भी आकर्षक बनाएगी। साथ ही शिवरात्रि के मौके पर पुरात्विक शिव मंदिर में विशेष पूजा अर्चना भी होती है। जिसमें नवदंपति अपनी मनोकामना लेकर पूजा में शामिल होते हैं।

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