लेख:1जुलाई…संविलियन दिवस…शिक्षाकर्मियों के लंबे संघर्ष के बीच का एक राहत भरा पड़ाव का दिवस



शिक्षाकर्मी से शिक्षक पंचायत, शिक्षक पंचायत से शिक्षक एल बी पदनाम के साथ शासकीय शिक्षक बनने के लिए संघर्ष, शून्य से शिखर तक पहुंचना, नियमितीकरण, संविलियन से पेंशन तक, प्राथमिक शाला प्रधान पाठक, शिक्षक, माध्यमिक शाला प्रधानाध्यापक से लेकर अब व्याख्याता व प्राचार्य पदोन्नति की दिशा में संघर्ष की बदौलत मिले सफलता व उपलब्धि तथा सुविधा के एक एक कदम, 20-22 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद 1 जुलाई 2018 को शिक्षा विभाग में संविलियन की शुरुआत हम शिक्षा कर्मियों के लिए बदलाव का एक नया दिवस रहा है! कई पदनाम बदले, पर शिक्षा कर्मी के रूप में संघर्ष पर विभाग में स्थायीकरण की दिशा में संविलियन से प्रदेश के शिक्षा कर्मियों को एक राहत का अहसास हुआ! 

     अविभाजित मध्यप्रदेश में 1998 से शिक्षा कर्मी प्रथा की शुरुआत हुई! 1994-95 से अस्थायी रूप से 1-1 सत्र के लिए पीड़ा दायी सत्रांत माह अप्रैल में सेवा समाप्ति की शर्त पर 500 रू की अल्प मासिक मानदेय पर कार्य कर रहे हम शिक्षा कर्मियों को 1998 में नियमित वेतनमान में नियुक्त कर सेवा नियमित करने नए सिरे से भर्ती प्रक्रिया से गुजरना पड़ा! जिसमें पूर्व सेवा के आधार पर बोनस अंक निर्धारण व लाभ देकर नियुक्त किया गया! 1998 व उससे पूर्व से ही संगठित होकर नियमित शिक्षकों के समान सुविधा, वेतनमान, नियमितीकरण के लिए संघर्ष व आंदोलनों की शुरुआत हो चुकी थी! उस समय अविभाजित मध्यप्रदेश में हम शिक्षाकर्मियों की संख्या लगभग 28 हजार थी! संघर्ष के शुरुआत दौर से ही ब्लॉक, जिला व राज्य स्तर पर प्रदर्शन, आंदोलन से अपनी मांगों को रखते रहे! प्रदर्शन व आंदोलन के तरीके भी बहुत कष्टदायी व अनूठे रहे! कभी आमरण अनशन, जल में प्रदर्शन, मंदिर में ज्ञापन, जमीन पर लोटते हुए मंदिर तक पहुंचना ,भूख हड़ताल,सामूहिक मुंडन ,जेल भरो आंदोलन, एक दिवसीय, अनिश्चितकालीन आदि सभी तरीके मांगों के लिए अपनाए गए! जेल गए, लाठियां खाई, एस्मा का दंश झेला! जय स्तंभ चौक रायपुर में ऐतिहासिक प्रदर्शन, सेंट्रल जेल में प्रदर्शन,मोती बाग में आमरण अनशन, भिन्न भिन्न जेलों में प्रताड़ना सहित कई प्रदर्शन स्मरण मात्र से सिहरन पैदा करता है! आंदोलन व संघर्ष का ही परिणाम रहा कि 2003 में नया वेतनमान, पदोन्नति की शुरुआत, 2005-2006 में नया वेतनमान, 2012 में समयमान वेतनमान, 2013 में पुनरीक्षित वेतनमान व आगे 6 वे व 7 वे वेतनमान का लाभ मिलने लगा! परंतु प्रत्येक वेतन सुधार में नियमित शिक्षकों की तुलना में विसंगति पूर्ण वेतनमान व विसंगति पूर्ण निर्धारण पीछा ही नहीं छोड़ रही थी! बढ़ती महंगाई व भविष्य की चिंता हर एक शिक्षा कर्मियों को शिक्षा विभाग के नियमित कर्मचारियों के समान सुविधा व वेतनमान के लिए संघर्ष करने मजबूर कर रहा था! नियमितीकरण, समान कार्य- समान वेतन, संविलियन आदि समय के साथ मांगे बदलती गई! इसी बीच नई भर्तियां होती रही, शिक्षा कर्मियों का कुनबा भी बढ़ा व बढते बढते लगभग पौने दो लाख तक पंहुच गया! संगठित होते रहे, संघर्ष और तेज होने लगा, संघर्ष के लिए बने संगठन व समूह में बिखराव भी हुआ, नए संगठन भी बने, परंतु मांगों पर सहमति बनाकर साझा मंच से बडे़ बडे आंदोलनों व संघर्ष का दौर चलने लगा! हर आंदोलन से लाभ ही मिला, चाहे वेतन में 100 रू का न्यून बढोत्तरी की घोषणा हो या  7 वर्ष की सेवा पर पदोन्नति की शुरुआत, अंशदायी पेंशन, अनुकम्पा नियुक्ति, अग्रेसिया राशि प्रावधान, स्थानांतरण,समयमान वेतनमान का लाभ मिलने लगा! धीरे धीरे छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े कर्मचारी संगठन के रूप में हर मुद्दे व विषय को सरकार के समक्ष बड़ी मजबूती से रखा व सरकार को सोचने व निर्णय लेने मजबूर भी किया! हम शिक्षाकर्मियों के आंदोलन में ऐसा भी निर्णय का समय भी आया कि कर्मचारी जगत में सोचनीय निर्णय हुआ. आंदोलन के दौर में शून्य पर आंदोलन से वापसी का निर्णय भी लिया गया! उक्त आंदोलन के दौरान लगभग 18-19 शिक्षक दिवंगत भी हुए! पर शून्य पर वापसी का निर्णय भी देर तलक परिणाम में तब्दील हुआ और सरकार को 2018 में शिक्षा विभाग में अलग एल बी कैडर के साथ संविलियन की घोषणा करने मजबूर भी होना पड़ा! तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह ने प्रदेश के शिक्षाकर्मियों को एक जनसभा में अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की उपस्थिति में शिक्षा विभाग में संविलियन की घोषणा की! पूरे प्रदेश के हम शिक्षा कर्मियों में खुशियाँ छा गई! कैबिनेट में निर्णय व जारी आदेश पर 8 वर्ष के बंधन से कुछ साथी नाराज भी हुए, आगे परिस्थितियां बदली, सभी को लाभ की मांगों का भी दौर चला! आखिर में 2 वर्ष की सेवा में सभी के संविलियन का अच्छा  निर्णय व घोषणा पूर्व की सरकार ने की!व लगभग 300 शिक्षा कर्मियों को छोड़कर सभी शिक्षा कर्मी विभागीय संविलियन के दायरे में आ गए,, यह भी एक ऐतिहासिक निर्णय हुआ! संविलियन की घोषणा व निर्णय से हम शिक्षा कर्मियों को अपने भविष्य पर स्थायीकरण का एक पडाव मिला! यूँ कहें कि 500-600 रू से 50-60-70 हजार तक के वेतन तक पहुंचने, अन्य सुविधाओं को पाने, 1-1 रू के लिए संघर्ष ही एकमात्र रास्ता रहा! सरकारें बदलती रहीं, कई कमेटियां बनी, संघर्ष में कई शिक्षक साथियों की शहादते हुई, पर आज भी इन 25-26 वर्षों की संघर्ष यात्रा में संविलियन के पड़ाव के बीच अभी भी कई मुद्दे व विषय है, जिस पर निर्णय लेने की आवश्यकता है! प्रथम नियुक्ति तिथि से सेवा गणना न होना, पेंशन व क्रमोन्नति पर पूर्व सेवा का लाभ न मिलना, वेतन विसंगति दूर न होना, समय पर पदोन्नति नहीं किया जाना आदि मुद्दे अभी भी संघर्ष को आमंत्रित कर रहा है, धरातल पर रणनीतियां भी बन रहीं हैं! सबसे ज्यादा तकलीफ आज भी संघर्ष की शुरुआत करने वाले 1998 से नियुक्त शिक्षा कर्मियों की है.. न पुरानी पेंशन का लाभ.. न क्रमोन्नति का प्रावधान.. वर्ग-1 के लिए पदोन्नति भी नही.. वेतन विसंगति में सुधार पर निर्णय नहीं.. ये सभी विषय आज भी पीड़ा दे रही है! व बिना लाभ सेवानिवृत्ति भी हो रही है! यूँ कहें कि हम शिक्षा कर्मियों का पूरा सेवाकाल संघर्ष का रहा है, कई साथी बिना पेंशन व लाभ के सेवानिवृत्त हो रहे हैं! अभी भी सरकार को शिक्षक एल बी संवर्ग के लाभ, सुविधा, मांग व मुद्दे पर सकारात्मक निर्णय लेने की आवश्यकता है! पर संविलियन ने संघर्ष पर एक राहत जरूर दी है, पर पूर्ण नहीं.. संघर्ष की गाथा तो अगाध है.. कहना बहुत है पर अंत में.. 

*वो कहते रहे.. ये नहीं होगा… ये असंभव है..*

*पर हारे नहीं.. हौसला टूटा नहीं…थके नहीं.. संघर्ष करते रहे.. और संविलियन ले लिया..*

दिलीप साहू

जिलाध्यक्ष

छत्तीसगढ़ टीचर्स एसोसिएशन, जिला- बालोद ( छत्तीसगढ़)

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