जीवन मुक्तता की कथा है श्रीमद्भागवत- संत निरंजन



बालोद। तांदुला के तट पर बसे बालोद नगर के आमा बगीचा में पुरुषोत्तम सुकतेल एवं पूर्णिमा सुकतेल के शुभ संकल्पों से आयोजित नौ दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के पावन अवसर पर भागवत आश्रम लिमतरा से पधारे संत निरंजन महाराज ने प्रथम दिवस की कथा यात्रा में व्यासपीठ से जीवन और जगत, आत्मा और परमात्मा को विश्लेषित करते हुए कहा कि महर्षि वेदव्यास ने मंगलाचरण में वेद उपनिषद का सार श्रीमद् भागवत कथा में प्रकट किए हैं। श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक में सत्यं परम धीमहि कहकर सत्य को ईश्वर और ईश्वर को ही सत्य कहा है। परमात्मा ही सत्य स्वरूप है । स्वामी जी ने कहा कि यह जगत प्रपंच ही ब्रह्म की सत्ता है चाहे आस्तिक हो या नास्तिक सत्य को सदा सभी लोग स्वीकार करते हैं। रामचरितमानस की पंक्ति का उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने कहा कि आगम निगम पुरान बखाना ।सत्य न धरम दूसर समाना। संसार के जितने भी धर्म पंथ मत मतांतर है वह सत्य से ही प्रकट हुए हैं ।वृंदावन के गोपियों ने अंत में यही कहा है कि मैं ही कृष्ण हूं। आत्मज्ञान हो जाने पर जगत ब्रह्ममय हो जाता है ।प्रकृति, भगवान सबके लिए समान है वैसे ही पात्र अपने अनुसार उस तत्व को धारण कर लेता है ।अग्नि, वायु, जल संपूर्ण जगत के लिए समान है। भेद तो केवल अपने मन में है । पूज्य स्वामी जी ने कहा कि नैमिशारण्य के पावन तट पर सूत जी कहते हैं कि परमात्मा का नाम अनंत है ,कथा अनंत है, रूप अनंत है ,लीला अनंत है जैसे मिट्टी से हमारा परिचय है लेकिन मिट्टी के बने सामान अनंत है। जैसे कमीज में कमीज को खोजेंगे तो कमीज मिलने वाला नहीं है वह तो केवल सूत है। झुमका में झूमका खोजेंगे तो झुमका मिलने वाला नहीं हुआ वह केवल सोना है ।वैसे ही सबका आधार ब्रह्म है ।यही आत्मज्ञान है आत्मतत्व है।

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