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सेन समाज का बड़ा फैसला: धर्मांतरण पर सख्ती, फिल्मी रस्मों पर रोक और माहुल पत्तों से भोजन अनिवार्य

परंपरा, सामाजिक मर्यादा और पर्यावरण संरक्षण को लेकर ऐतिहासिक निर्णय

बालोद। बालोद जिला सेन समाज की विशेष बैठक में समाज की परंपराओं, सामाजिक मर्यादा और पर्यावरण संरक्षण को मजबूत करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय लिए गए। समाज के मीडिया प्रभारी उमेश कुमार सेन ने जानकारी देते हुए बताया कि ये फैसले समाज की एकता, सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

धर्म परिवर्तन पर कड़ा रुख, रोटी-बेटी संबंध समाप्त करने का निर्णय

बैठक में यह निर्णय लिया गया कि यदि सेन समाज का कोई भी व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है या धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों में शामिल होता है, तो उसके पूरे परिवार को समाज से रोटी-बेटी के संबंध से वंचित कर दिया जाएगा। समाज का कहना है कि यह निर्णय आस्था, एकता और सनातन धर्म की रक्षा के लिए लिया गया है ताकि समाज की परंपराएं और मूल मूल्य सुरक्षित रह सकें।

शादी-ब्याह में फिल्मी परंपराओं पर पूर्ण प्रतिबंध

समाज ने विवाह और अन्य सामाजिक आयोजनों में फिल्मी परंपराओं को समाप्त करने का भी निर्णय लिया है। विशेष रूप से साली द्वारा जूता छुपाने जैसी रस्मों को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया गया है। समाज के अनुसार यह आधुनिक दिखावे की परंपरा है, जो कई बार विवादों को जन्म देती है और समाज की सादगीपूर्ण संस्कृति के विपरीत है।

नया नियम: अब हर सामाजिक आयोजन में माहुल (सिहरी) पत्तों से ही भोजन

बैठक में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए एक अहम निर्णय लेते हुए कहा गया कि अब से समाज के सभी सामाजिक कार्यक्रमों और भजन आयोजनों में भोजन केवल पारंपरिक माहुल (सिहरी) के पत्तों से बने दोने-पत्तलों में ही कराया जाएगा।

पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी पहल

समाज ने बताया कि माहुल या सिहरी के पत्ते पूरी तरह प्राकृतिक, जैव-विघटनीय और पर्यावरण के अनुकूल होते हैं। इनके उपयोग से प्लास्टिक और थर्माकोल से होने वाले प्रदूषण को रोका जा सकता है। साथ ही इन पत्तों में प्राकृतिक औषधीय गुण भी होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं। यह परंपरा पूर्वजों की पर्यावरण-मित्र सोच को आगे बढ़ाने का प्रतीक भी है।

समाज ने दिया संस्कार और सादगी का संदेश

मीडिया प्रभारी उमेश कुमार सेन ने कहा कि सेन समाज हमेशा परंपरा और प्रकृति के साथ सामंजस्य में रहा है। माहुल पत्तों का उपयोग केवल भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान का प्रतीक है। आधुनिक दौर में जब पर्यावरण संकट बढ़ रहा है, तब ऐसी परंपराओं का पुनर्जीवन समाज के लिए प्रेरणादायक कदम है।

बैठक में उपस्थित सभी सदस्यों ने इन निर्णयों का सर्वसम्मति से समर्थन किया और समाज के सभी लोगों से अपील की कि हर कार्यक्रम में इन नियमों का पालन कर संस्कार, सादगी और स्वच्छता का उदाहरण प्रस्तुत करें।

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