मिलिए इनसे ये हैं बालोद जिले के महज 20 साल के साहित्यकार खुमान, जिन्होंने दो साल में ही हासिल कर ली है अनूठी रचनाओं में उपलब्धि, मिलें कई सम्मान



बालोद/गुरुर – आज हम आपको बालोद जिले में सबसे कम उम्र के साहित्यकार से परिचय करवा रहे हैं. जिन्होंने महज दो साल में ही इस क्षेत्र में अच्छी खासी पकड़ बना ली है. वे शख्स हैं 20 वर्षीय खुमान सिंह भाट. जो गुरुर ब्लॉक के रमतरा के रहने वाले हैं. समसायिक विषयों के अलावा अन्य विषयों पर वे रचना लिखते हैं. अभी उन्होंने कोरोना व योग दिवस पर भी लिखा है. गरीब परिवार में पले बढ़े खुमान चार भाइयों में सबसे छोटा है. जब वे महज 4 साल के थे तब से उनके सर से पिता का साया छूट गया. उनकी मां ने रोजी मजदूरी करके चारो बेटों को पाला और आज सभी बेटे अपने पैरों में खड़े हैं. खुमान साहित्यकार के अलावा गुरुर के एक कंपनी में कंप्यूटर ऑपरेटर भी है. कम उम्र में घर संभालने की जिम्मेदारी भी उस पर है. इससे उन्हें प्रेरणा ही मिली हैं और अपनी रचनाओं में निखार लाते रहे हैं. DAILYBALODNEWS से ख़ास बातचीत में युवा साहित्यकार खुमान ने बताया प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई. आगे की पढ़ाई मैंने शासकीय हाई स्कूल पेंवरो से कक्षा दसवीं की परीक्षा पास की. पेंवरो में मात्र  दसवीं तक की शिक्षा मिलती है. मुझे विज्ञान में बहुत रुचि थी इसलिए मैंने शासकीय हायर सेकेण्डरी स्कूल छेडिया  में दाखिला लिया व दो वर्ष तक नियमित अध्ययनरत रहा. सत्र 2019-20 में मैंने 12 वी की परीक्षा उत्तीर्ण की। मेरे पिता स्व. पुनित राम भाट थे. माता का नाम  श्रीमती  चितरेखा देवी भाट है. बचपन में मुझे पिता का प्यार नहीं मिल पाया पर  मां ने हमें कभी किसी की कमी आने नहीं दिया. हमारे परिवार में मेरे अलावा तीन भाई और है जो मुझे बेहद प्यार करते हैं और मैं भी उनका बहुत सम्मान करता हूं। मैं बचपन से ही भावों – अभावों शिकार रहा. पर छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है कि” घुरूवा के दिन घलो बहुरथे, भले ही लोगों के लिए यह कहावत हों पर मेरे लिए यह एक प्रेरणा से कोई कम नहीं, वैसे तो हमारे घर में टी.वी. नहीं है पर जब भी मन होता तो मैं अपने एक मित्र के यहां जाकर देख आता.  संध्या बेला पर एक संत का सत्संग आता  जिसका मैं नियमित स्रोता हूं।

संत के प्रवचन से मिली साहित्यकार बनने की प्रेरणा, उठा लिया कलम

उक्त संत ने एक कार्यक्रम के दौरान अपनी विचारधारा अभिव्यक्त करते  कहा था कि हम केवल दुसरे द्वारा रचित कविता कहानी उपन्यास का पाठन करते हैं, क्यों न हम भी स्वयं रचनाएं लिखें, जिसे पुरी दुनिया  पठन-  पाठन करे.’ बस उसी दिन से मैंने ठान लिया कि अब मुझे भी साहित्य में डुबकी लगाना है। पर साहित्यकार बनना यूही  आसान बात नहीं है. बस कह दिया और हो गया.  किसी कवि ने  क्या खूब कहा  है –

‘कविता कोई मनोरंजन का साधन नहीं, यह आत्मानुशासन का  उन्मेष है , कविता कोई रंगीनी या सजावटी नहीं, यह स्वयं को चीरने का प्रयास है. जो स्वयं को चीरता है वह मनुष्य की जड़ता को भी चीर सकता है.  मैंने निरंतर अध्ययन जारी रखा और धीरे-धीरे अपनी टूटी फूटी भाषा में कुछ लिखना शुरू किया. पर मैं कभी-कभी अपने आप पर यह पाया कि मेरी रचना सार्थक नहीं है. मैं  इतना परिपक्व नहीं हूं. जो एक  सफल साहित्यकार  होता है. फिर भी मैं अपने पथ पर अडिग रहा.

मंच संचालन से मिली एक नई पहचान

खुमान बताते हैं बात उन दिनों की है जब हमारे विद्यालय  परिसर में हिंदी दिवस का आयोजन होना था. सभी सहपाठी बहुत दिनों से तैयारी में लगे थे और सारी व्यवस्थाएं लगभग पूर्ण हो गई थी. पर एक चीज बचा रहा वह यह  था कि मंच का संचालन कौन करेगा ? और सर्व सहमति से मुझे मंच संचालन करने का दायित्व मिला। उस दिन मानो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मुझे एक प्लेटफार्म मिल गया. मंच में उपस्थित समस्त गुरुजनों का अभिवादन कर कार्यक्रम का श्री गणेश किया. बारी बारी से हमारे विद्यालय के उभरते हुए साहित्यकार अपनी रचनाएं समर्पित करते गए छुपेरुस्तम प्रतिभा भी सामने आते गए और अंत में मुझे भी आमंत्रित किया गया. मैंने भी अपने अंदाज में कविता का पाठन किया. सभी का स्नेह दुलार भरपूर मिला. सभी ने बहुत खूब तालियां बजाई. तालियों की गुंजन से विद्यालय परिसर खिल उठा  वह दिन साहित्य यात्रा का मेरा पहला दिन था. तब से निरंतर लेखन कार्य जारी रखा.

शिक्षक हैं उनके मार्गदर्शक

खुमान कहता है मैं जब भी कलम उठाता रचनाएं लिख लेता तो सबसे पहले मैं अपने हिंदी के शिक्षक शैलेंद्र चेलक को समीक्षा करने के लिए एक बार अवश्य भेजता हूं. उन्होंने अपने बहुत सी रचनाएं स्वरचित लिखा करते थे और वे भी उभरते हुए सितारे है. जिसने अपनी कविता से बहुत सारी ख्याति प्राप्त किए हैं. मैं उन्हीं का अनुसरण करता हुआ और साहित्य यात्रा प्रारंभ किया. उनके मार्गदर्शन में मेरी रचनाएं महासमुंद के “मेरी रचना मेरी ट्रेड”में प्रकाशित हुई. जिसके संपादक प्राज पुखराज यादव है. जिसने दुनिया के कोने कोने में छुपेरुस्तम तमाम कवि साहित्यकारों के लिए यह मंच समर्पित किए हैं, जिसमें मेरी रचना “सुनता के डोरी” पूरे छत्तीसगढ़ से तृतीय स्थान पर सुशोभित रहा.तब से मेरी साहित्य यात्राएं जारी है.

यह सम्मान मिलें इस साहित्यकार को

फूलवती देवी साहित्य सम्मान,बाल साहित्य सम्मान, मृतिका सारथी साहित्य सम्मान, स्वामी विवेकानंद साहित्य सम्मान,श्री कमलेश्वरी मंडल स्मृति काव्य दूत सम्मान।

उनकी रचनाओं की कुछ पंक्तियां पढ़िए

मैं कवि नहीं , मैं शायर नहीं

मनमौजी मन चंचल हूं

अपने मन का चिंतन को कागज…

के पन्ने पर रखता हूं

गलती होती रहती है

कोशिश करता रहता हूं

एक दिन मेरी कलम खेलेगी

दुनिया के पन्नों पर

यही विश्वास लेकर मैं लिखता हूं… 

धन्यवाद …!

आपका 

~ खुमान सिंह भाट ~

योग दिवस पर उन्होंने ये लिखा है

योग, जीवन उत्थान मार्ग हैयोग, षष्टांग-अष्टांग मिलन है
योग, साधन संयम ध्यानसमाधि प्राकृती परिभाषा हैयोग, मंत्र योग, लययोग,राजयोग और हठयोग का ज्ञान है
योग, मनका रंजन एवं उसका विस्तार हैयोग, आत्मा से परमात्मा का मिलन है
योग, चेतन केंद्रित का साधन हैयोग,जगत कल्याण के लिए अर्पित है
योग, आत्मा साक्षात्कार अनुभव हैयोग, परब्रह्म-जीवात्मा अविरल संबंध है
योग, मन एवं प्राण का आधार हैयोग, प्रकृतिधर चेतन पथ प्राप्ति है
योग, अणु परमाणु संबंध हैयोग, मनुष्य से आध्यात्मिकता का बोध है
योग, पंच तत्व दर्शन हैयोग, ज्ञान अनंत हैजानो यह सब कोय,योग, करें सोय जीवन मंगलमय होए

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