यदि हम भारत को विकसित भारत के रूप में देखने की भूमिका के परिप्रेक्ष्य में बात करें, तो प्रश्न उठता है—हम कैसा विकसित भारत चाहते हैं? अमेरिका जैसा विकसित भारत, यूरोप जैसा विकसित भारत, या जापान जैसा विकसित भारत? नहीं! हम केवल भारत जैसा विकसित भारत चाहते हैं।
क्योंकि हमारी संस्कृति, हमारा परिवेश और हमारा वातावरण भिन्न है।
किसी देश को विकसित कब माना जाता है? इसका पता उस देश की समृद्धि, उसकी खुशहाली और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी हैसियत से चलता है।
किसी देश की आर्थिक स्थिति का आकलन उसकी जीएनपी (कुल राष्ट्रीय उत्पाद), जीडीपी (कुल घरेलू उत्पाद), विदेशी मुद्रा भंडार, आर्थिक विकास दर, प्रति व्यक्ति आय आदि से किया जाता है।
भारत को विकसित बनाने के लिए पाँच स्तरों पर उसे मजबूत करना होगा—
- आर्थिक रूप से
- सामाजिक रूप से
- सांस्कृतिक रूप से
- राजनीतिक रूप से
- विकासशील से विकसित बनने की प्रक्रिया के प्रभावी क्रियान्वयन में
1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, 1991 ईस्वी से हमने वैश्विक मंच पर अपने पक्ष को अधिक सशक्त रूप से प्रस्तुत करना प्रारंभ किया।
यह काल स्वर्णिम काल है, क्योंकि यह युवाओं का भारत है। इसके कंधे अधिक सशक्त हैं।
हमें पश्चिमी देशों की नकल करने के बजाय इस बात पर अधिक ध्यान देना होगा कि हमारी कमजोरियाँ क्या हैं, और उन कमजोरियों को दूर करना होगा।
धर्मवाद, सम्प्रदायवाद, मत-मतांतर, भेद-भाव को भुलाकर हमें राष्ट्र जागरण और राष्ट्रवाद की ओर अग्रसर होना होगा।
“तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित” की भावना को सशक्त कर उसे व्यवहार में लाना होगा।
ताकि जब हम 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूर्ण होने पर 1947 की ओर देखें, तो हमें यह अनुभव हो कि हमने अपने शहीदों की कुर्बानियों को व्यर्थ नहीं जाने दिया।
हमें कोई मलाल न हो।
हमें यह महसूस होना चाहिए कि विज्ञान, संस्कृति, जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय के साथ-साथ हम हर संसाधन में आत्मनिर्भर हैं। हमारे राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति सशक्त, सक्षम और साक्षर हो।
विकसित होना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि इससे हमारी पहचान सुदृढ़ होती है।
सोलहवीं शताब्दी में गैलीलियो गैलिली ने दूरबीन का आविष्कार किया, जिससे सौरमंडल की जानकारी विश्व को प्राप्त हुई। किन्तु हमारे प्राचीन ऋषि-मनीषियों ने यह ज्ञान हजारों वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया था। नवग्रहों की पूजा इसका प्रमाण है।
किन्तु हम इस सत्य को वैश्विक मंच पर सशक्त रूप से प्रस्तुत नहीं कर सके, क्योंकि उस समय हमारे आधार सुदृढ़ नहीं थे।
इसलिए हमें विकसित होना आवश्यक है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ जब विश्व का मानचित्र देखें, तो उन्हें हर राष्ट्र अपने समकक्ष प्रतीत हो।
शिक्षा, स्वास्थ्य, संसाधनों और विज्ञान के क्षेत्र में उन्हें अपना देश किसी से भी पीछे न लगे।
ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि जब तक कोई देश यह विश्वास नहीं कर लेता कि वह विकसित हो सकता है, तब तक वह विकसित नहीं हो सकता।
इसलिए भारतीय युवाओं में वह विश्वास और सामर्थ्य जागृत करना होगा, जिससे वे स्वयं को विकसित भारत का निर्माता मानें।
जो राष्ट्र कभी विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा हो, उसे आज विकासशील देश के रूप में देखा जाना इस बात का संकेत है कि हमने बहुत कुछ खोया है।
हमारी सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना धीरे-धीरे क्षीण होती जा रही है।
यदि किसी गाँव में एक बहुमंजिला इमारत हो और बाकी झुग्गियाँ, तो उसे विकसित गाँव नहीं कहा जा सकता।
किन्तु यदि सभी के घर साधारण ही सही, पर व्यवस्थित हों और रास्ते स्वच्छ हों, तो वह गाँव विकसित कहलाता है।
भारत में न संसाधनों की कमी है, न अवसरों की। आवश्यकता है प्रत्येक व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने की, उन्हें कौशल प्रदान करने की और उनकी आय को सुदृढ़ करने की।
हमारा विश्वास है कि प्रज्वलित युवा मस्तिष्क सबसे शक्तिशाली संसाधन होते हैं—धरती के ऊपर, आकाश में या पृथ्वी के नीचे छिपे किसी भी संसाधन से कहीं अधिक।
हम सभी को मिलकर इस विकासशील भारत को विकसित भारत में परिवर्तित करने के लिए कार्य करना होगा।
इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक क्रांति हमारे मस्तिष्कों में जन्म लेनी चाहिए।
सभी क्षेत्रों में भारत सरकार और भारतीय जनतंत्र के सामूहिक प्रयासों से यह मार्ग जिस प्रकार प्रशस्त हो रहा है, उससे यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि हम स्वतंत्रता की 100वीं वर्षगांठ पर एक राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से सशक्त, सक्षम और मार्गदर्शक विकसित भारत में यह उत्सव मनाएँगे।
मिट्टी ने चुपचाप बीजों से कहा—समय आने दो,
मैं खुद को वृक्ष बनाकर आकाश से बात करूँगी। 🌱
ऋचा चंद्राकर 'तत्वाकांक्षी'
