अहं ब्रह्मास्मि : एक रचना ऋचा चंद्राकर “तत्वाकांक्षी” की



अहं ब्रह्मास्मि

जगत के ईश्वर उतरे हैं, धरा में राम बनकर।
तुम मूर्तियों में खोजते, मनुष्यता को तजकर।।

वे अनंत अवतारों में, भिन्न रूप लें — वही हैं।
बसे सारे जड़-चेतन में, कुछ और न कहीं हैं।।

वे दिखने में भिन्न-भिन्न, और हर कृत्य अनेक हैं।
ज्यों मशीनी हरकत बहुत, पर विद्युत तो एक है।।

इन क्रियाओं को देखकर, तुम यूँ ही भटक जाते हो।
क्रिया में कर्ता एक शक्ति — उन्हें समझ न पाते हो।।

भिन्न-भिन्न क्रियाएँ हैं, पर वे स्वयं ही अभिन्न हैं।
ज्यों आकाश में विविध रूप, भासते विच्छिन्न हैं।।

जो भासमान दिख रहा है, वहीं तो ईश्वरी माया है।
वही जो भास में आभास, मन, इन्द्रिय और काया है।।

जो है नहीं त्रिकाल में, फिर भी दिखाता सत्य सो।
देखता जो मन तुम्हारा, बुद्धि सहित अनित्य को।।

समझ तू अपनी समझ से — समझ से नासमझ है।
जो समझ में आ भी जाए, सो भी तो अनसमझ है।।

समझ जब प्रत्यर्पित होगी, सब समझ से पार हो।
तो समझ में जो भी आए — बस “वही” दीदार हो।।

जो समझ से अनसमझ हो, वही तो परब्रह्म है।
देख इन्द्रियातीत होकर — तू “वही” नहीं, भ्रम है।।

“ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।” (गीता, 4/24)

“स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः स्वयमिन्द्रः स्वयं शिवः।
स्वयं विश्वमिदम् सर्वं स्वस्मादन्यन्न किञ्चन।।” (आदिशंकराचार्य कृत विवेकचूड़ामणि)

    ऋचा चंद्राकर "तत्वाकांक्षी"

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