DAILY BALOD NEWS

EDITOR IN CHIEF – DEEPAK YADAV.9755235270

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मनुष्य भव ही एक ऐसा भव है जिसमे मोक्ष मार्ग की साधना की जा सकती है

बालोद। कई जन्मों के कुसंस्कार जो हमारे अंदर भरे पड़े है उन्हें दूर कर धर्म आराधना की जा सकती है। 171 दिनों के उपवास के आराधक एवम संत विनय कुशल मुनि के शिष्य विरागमुनि जी ने अपने प्रवचन श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हम धर्म आराधना करते हुए पापो से दूर रहते हैं फिर भी सुख और शांति की अनुभूति नही होती।दरअसल हमारे अंदर के पूर्व के कई जन्मों के कुसंस्कार होते है जो अवसर आते ही प्रगट हो जाते हैं और पाप के बंध होते जाते है। किसी भी तरह के पाप के भावों के प्रति हमारे मन मे धिक्कार भाव बोना चाहिए जिससे कि वो हम पर हावी न हो सके।भगवान के बताए मार्ग पर चलने की पूर्ण आस्था के अभाव में किया गया धर्म मात्र दिखावा क्रिया मात्र है।भगवान ने रात्रि भोज जमीकंद का निषेध बताया है किंतु इन प्रारंभिक चीजो का ही यदि पालन नही कर पाते हैं तो अन्य बड़ी चीजों का पालन कैसे कर सकते हैं।। क्रोध ,मान ,माया ,लोभ आत्मा पर लगे कषाय है जिन्हें दूर कर ही आत्मा का हित किया जा सकता है।ये चारों आपस मे चांडाल चौकड़ी की तरह है ये हर जगह साथ ही होते हैं। इन कषायों को दूर करके ही धर्म किया जा सकता है।जैन धर्म तो जगत के प्राणी मात्र के लिए प्रेम और वात्सल्य की बात कहता है।आज हम देखते हैं कि अपने ही संबंधियों के साथ हमारे संबंध कटुता जे भरे हुए हैं।अपने अंदर के दुर्गुणों को दूर किये बिना न तो धर्म किया जा सकता और न ही सुख शांति प्राप्त की जा ज़क्ति है।संत श्री ने धर्म की व्याख्या करते हुए उक्ताशय के विचार व्यक्त किये।उक्त जानकारी रूपचंद गोलछा ने दी।

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