भगवान वराह के बाल से पैदा हुए हैं दूबी और कुश, भगवान विष्णु के वराह अवतार ने दैत्य हिरण्याक्ष से बचाया था पृथ्वी को



बालोद/ गुरुर। गुरुर ब्लॉक के ग्राम टेंगना बरपारा में शिव महापुराण कथा का भव्य आयोजन 30 नवंबर से लेकर 6 दिसंबर तक किया जा रहा है। कथा समय प्रतिदिन दोपहर दो से शाम 6 बजे तक है। कथावाचक ग्राम बगदई वाले पंडित चैतन्य पाण्डेय हैं। कथा के तीसरे दिन पंडित चैतन्य पांडेय ने
2 दिसंबर को नारद मोह, सृष्टि वर्णन, धनपति कुबेर परिचय के बारे में बताया। कथा
प्रसंग में उन्होंने बताया भगवान विष्णु ने कुल 24 अवतार लिए हैं। मत्स्य और कश्यप के बाद तीसरा अवतार है वराह। वराह यानी शुकर। इस अवतार के माध्यम से मानव शरीर के साथ परमात्मा का पहला कदम धरती पर पड़ा। मुख शुकर का था, लेकिन शरीर इंसानी था। उस समय हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने अपनी शक्ति से स्वर्ग पर कब्जा कर पूरी पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया था। हिरण्याक्ष का अर्थ है हिरण्य मतलब स्वर्ण और अक्ष मतलब आंखें।

जिसकी आंखें दूसरे के धन पर लगी रहती हों, वो हिरण्याक्ष है। पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। इसके पश्चात भगवान वराह अंतर्धान हो गए। भागवत और शिव पुराण में जिक्र है कि जब ब्रह्मा जी कमलपुष्प विराजे तो भगवान विष्णु ने उन्हें सृष्टि रचना का आदेश दिया। जो दूब और कुश की कथा सुनते हैं वह भी वराह अवतार से जुड़ी है। पृथ्वी पहले समुद्र के अंदर थी। हिरण्याक्ष नामक दैत्य पृथ्वी को लेकर समुद्र के अंदर चला गया था। ब्रह्मा जी के नाक के क्षेत्र से वराह भगवान का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसा भागवत और शिव महापुराण में बताया गया है। भगवान वराह हिराण्यक्ष से युद्ध करते-करते आए तो एक महिष्मति नगर में भगवान ने अपने बाल को झड़ाया तो नदी में बाल गिरते गए। जैसे ही बाल झड़े तो एक-एक बाल का केश उस नदी में प्रवाहित हुआ। वही केश से दूबी और कुश बना। यह वही कुश है जो हम पितृ पक्ष के समय उपयोग करते हैं और दूबी को भगवान के शुभ कार्य के समय उपयोग करते हैं। इसलिए गणेश जी को दूबी प्रसन्न करते हैं। लेकिन उन्हें तुलसी प्रिय नहीं है।

3 दिसंबर को होगी गंगा अवतरण, समुद्र मंथन, नारी धर्म, अर्धनारीश्वर की कथा1

आयोजकों में शामिल प्रमुख रूप से जिला पंचायत सभापति ललिता पीमन साहू ने समस्त शिव भक्तों और श्रद्धालु से ज्यादा से ज्यादा संख्या में इस शिव महापुराण कथा में शामिल होकर पुण्य प्राप्त करने की अपील की है। ग्राम पंचायत, ग्राम विकास समिति एवं समस्त ग्रामवासी टेंगना बरपारा सहित पीमन साहू, चमेली साहू, सरस्वती राजेश साहू व अन्य ग्रामीणों का आयोजन सहयोग बना हुआ है। 3 दिसंबर को गंगा अवतरण, समुद्र मंथन, नारी धर्म, अर्धनारीश्वर कथा, 4 दिसंबर को सती चरित्र, पार्वती जन्म, शिव विवाह उत्सव, 5 दिसंबर को कार्तिक गणेश उत्पत्ति एवं तारकासुर मोक्ष, राजासुर कथा, दुर्वासा एवं हनुमान अवतार, 6 दिसंबर को जालंधर वध, द्वादश ज्योतिर्लिंग, बाणासुर, अंधकासुर, भस्मासुर वध कथा, चढ़ावा, पंचाक्षर मंच, महिमा, शिव सहस्त्राचार, हवन पूर्णाहुति एवं प्रसाद भंडारा का आयोजन होगा ।

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