संविधान निर्माण के समय हिंदी प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे हैं घनश्याम सिंह गुप्त, उनके योगदान को याद रखने के लिए ही किया गया है बालोद कॉलेज का नामकरण
सुप्रीत शर्मा, बालोद। 26 नवंबर को देश में संविधान दिवस मनाया जाता है। जिस संविधान पर पूरा देश टिका हुआ है। उसके निर्माण में बालोद (तत्कालीन दुर्ग जिले) के घनश्याम सिंह गुप्त का भी विशेष योगदान रहा है। संविधान निर्माण में हिंदी प्रारूप समिति के वे अध्यक्ष रहे हैं। बालोद जिला मुख्यालय के लीड कॉलेज शासकीय कॉलेज बालोद का नामकरण भी उन्हीं की याद में रखा गया है । “शासकीय घनश्याम सिंह गुप्त महाविद्यालय” इस नाम को तो लोग जानते हैं। पर घनश्याम सिंह गुप्त कौन थे उनका देश में कैसा और किस तरह से योगदान रहा इस बात से आज की युवा पीढ़ी अधिकतर अनभिज्ञ है। कई लोगों को यह भी नहीं पता है कि आखिर नामकरण बालोद कॉलेज का क्यों किया गया। इस संविधान दिवस पर हम इतिहास के कुछ पहलुओं पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहें ताकि आज की युवा पीढ़ी हमारे इतिहास से सीख ले और ऐसे महापुरुषों और राष्ट्र नेताओं के बारे में जाने जिनकी देश की आजादी के साथ संविधान निर्माण में विशेष योगदान रहा।
बालोद कॉलेज की शुरुआत 15 अगस्त 1983 को एक स्नातक बहु संकाय सह-शिक्षा महाविद्यालय के रूप में ‘शासकीय विज्ञान, कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, बालोद’ के नाम से हुई थी। 2008-09 में इसका नाम बदलकर प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी घनश्याम सिंह गुप्ता पीजी कॉलेज के नाम पर रखा गया। शुरुआत में बालोद दुर्ग जिले के अंतर्गत आता था, लेकिन 10 जनवरी 2012 से इसे एक नए जिले में बदल दिया गया।
भारतीय संविधान तक ऐसी पहुंची हिंदी
आजादी के पहले सन 1946 में संविधान सभा की पहली बैठक हुई थी. इस बैठक में ही कुछ सदस्यों ने प्रस्ताव रखा कि संविधान का हिंदी में भी अनुवाद हो जिससे आम लोगों की भी पहुंच आसान हो सके. 1947 में अनुवाद समिति की पहली बैठक हुई. उसके बाद दूसरी बैठक में घनश्याम सिंह गुप्त को इस समिति का अध्यक्ष चुना गया था। 24 जनवरी 1950 को घनश्याम गुप्त ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान की हिंदी प्रति सौंपी ।
पहले विधानसभा अध्यक्ष बने,इसलिए विधान पुरुष भी कहलाते हैं
1937 के चुनाव में मध्य प्रांत में कांग्रेस की सरकार सत्तारूढ़ हुई. तब घनश्याम सिंह गुप्त विधानसभा अध्यक्ष बने. वो मध्य प्रदेश के पहले विधानसभा अध्यक्ष बने. 1952 तक इस पद पर रहकर कार्य करते रहे. अध्यक्ष के रूप में गुप्तजी ने हिंदी भाषा का समर्थन कर हिंदी का मार्ग प्रशस्त किया. 1938 में जब खरे मंत्रिमंडल ने त्याग पत्र दिया. उस समय विधानसभा के सदस्यों ने सरदार पटेल ने गुप्तजी से मुख्यमंत्री बनने की पेशकश की. लेकिन गुप्तजी ने मुख्यमंत्री बनने से इंकार कर दिया. आजादी के बाद भी वे लगातार नारी शिक्षा, सामाजिक चेतना के लिए काम करते रहे. धर्मांतरण को रोकने के लिए भी वे लगातार मुखर रहे. 13 जून 1976 को घनश्याम सिंह गुप्त का निधन हो गया. देश में 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, उसे भाषाई स्वरूप गुप्त ने दिया। घनश्याम सिंह गुप्त ने अंग्रेजी में लिखे संविधान के हिन्दी अनुवाद में खास भूमिका निभाई। गुप्त संविधान सभा के सदस्य होने के साथ संविधान के हिन्दी अनुवाद के लिए बनाई गई समिति के अध्यक्ष भी रहे।
दो बार जेल गए
गुप्त अंग्रेजी शासनकाल में सीपी एंड बरार स्टेट विधानसभा के लगातार 14 साल तक अध्यक्ष भी रहे और उन्होंने ही विधानसभा में हिन्दी व मराठी में कार्रवाई की शुरुआत करवाई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों पर चलकर छूआछूत और धर्मान्तरण के खिलाफ पूरे जीवन संघर्ष करने वाले गुप्त अंग्रेजी शासनकाल में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के खिलाफत की वजह से दो बार जेल भी गए।
41 विशेषज्ञों ने किया था अनुवाद
संविधान सभा द्वारा गुप्त के नेतृत्व में 41 विशेषज्ञों की टीम बनाकर संविधान के हिन्दी अनुवाद की जिम्मेदारी दी गई। टीम में राहुल सांकृत्यायन, डॉ. सुनीति चटर्जी, जयचंद विद्यालंकार, मोटुरि सत्यानारायण और यशवंत आर दाते उनके मुख्य सहयोगी थे। 2 साल 6 माह की मेहनत के बाद 24 जनवरी 1950 को संविधान का हिन्दी ड्रॉफ्ट संविधान सभा में रखा गया।
जानिए गुप्त जी का जीवन परिचय
घनश्याम सिंह गुप्त का जन्म दुर्ग में 22 दिसंबर 1885 में हुआ। दुर्ग में प्रारंभिक व रायपुर में उनकी हाईस्कूल की शिक्षा हुई। इसके बाद जबलपुर के राबर्ट्सन कॉलेज में बीएससी की पढ़ाई के बाद वे एमएसएसी और कानून की पढ़ाई इलाहाबाद में की। इलाहाबाद में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उनकी राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। वे 80 वर्ष की आयु तक राजनीतिक यात्रा में सक्रिय रहे। गुप्त दुर्ग के म्यूनिसिपल कमेटी व जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष रहे। वर्ष 1919 से 1956 तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे 1937 से 1952 तक वे सीपी एंड बरार विधानसभा के विधानसभा अध्यक्ष रहे।
गांधी-नेहरू, घर पर भी ठहरे
गुप्त राष्ट्रपिता महात्मा गांधी व पंडित जवाहरलाल नेहरू के भी काफी करीब थे। आजादी के पहले उनके बुलावे पर पंडित नेहरू दुर्ग आए और एक सभा को संबोधित किया। हरिजन मुक्ति आंदोलन के दौरान गांधी जी भी दुर्ग आए और गुप्त के निवास में ठहरे। इस दौरान गांधी जी ने शनिचरी बाजार स्थित बैथड स्कूल में अछूत समझे जाने वाले वर्ग के बच्चों के साथ बैठकर भोजन भी किया।
जीवनभर करते रहे जनसेवा
वे धर्मान्तरण के खिलाफ धार्मिक अन्याय को लेकर जीवन भर संघर्ष किया। मिशनरियों द्वारा धर्मान्तरण की जांच के लिए बनी राष्ट्रीय छानबीन समिति में वे सदस्य भी रहे। 30 वर्षों तक अभा आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष भी रहे। 13 जून 1976 को उनका निधन हुआ।
नारी शिक्षा के पक्षधर खोला दुर्ग जिले का पहला कन्या विद्यालय
छुआछूत और धर्मान्तरण के खिलाफ संघर्ष के साथ गुप्त ने बरसों पहले ही नारी शिक्षा का अलख जगाना शुरू कर दिया था। गुप्त का पूरा जीवन सामाजिक चेतना व नारी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए समर्पित रहा। उनके इस प्रयास को अब उनके परिजन ने उनके नाम पर कन्या विद्यालय और महाविद्यालय खोलकर आगे बढ़ा रहे हैं। साथ ही बालोद में कॉलेज का नामकरण उन्हीं के नाम पर करके शासन ने उनके कार्यों को अविस्मरणीय बनाया है।
