संस्कृति तो वनांचल में रची बसी है,,,, गणेश विसर्जन पर फूहड़ नहीं यहां गाए जाते है सुआ गीत , महिलाएं करती हैं बप्पा की विदाई में नृत्य



देवनारायण साहू, बालोद। गणेश विसर्जन पर अक्सर लोगों को डीजे की धुन पर फिल्मी गानों और फूहड़ता से भरे गानों पर नृत्य करते हुए देखा जाता है। यह आधुनिक संस्कृति हमारे आसपास हमेशा दिख जाया करती है। युवा भक्ति भाव को मनोरंजन की ओर खींच लेते हैं ।पर जब बात होती है वनांचल में तो यहां बप्पा की विदाई किसी भी तरीके के फूहड़ता से दूर होती है। बालोद जिले में एक ऐसा गांव भी है। जहां पर गणेश जी को विदाई देनी होती है तो लोग सुआ नृत्य करते हैं और गीत भी गाते हैं। यह अनूठी परंपरा है गुरुर ब्लॉक के ग्राम मुजालगोंदी की । जहां दिवाली नहीं बल्कि गणेश विसर्जन के दिन से ही सुआ नृत्य गीत की थाप सुनाई देती है। शुक्रवार को गणेश विसर्जन पर सुआ नृत्य की परंपरा निभाई गई है। यह परंपरा कई पीढ़ी से चली आ रही है। ग्रामीण इस परंपरा का निर्वहन करते आ रहे हैं। गणेश विसर्जन पर ग्रामीणों में अनोखी एक जुटता देखने को मिलती है। गांव में मुख्य स्थल पर गणेश प्रतिमा विराजित की गई थी। जिसका अंतिम दिन ग्रामीणों ने मिलकर विसर्जन किया। इस दौरान महिलाओं की टोली ने सुआ नृत्य भी किया। महिलाओं की सुआ नृत्य दल में शामिल राम दुलारी, मधु बर्मन, सावित्री मंडावी, तुलसी साहू, गोदावरी बर्मन ने बताया सुआ नृत्य हमारे छत्तीसगढ़ की विशेष संस्कृति का प्रतीक है। आज की आधुनिक पीढ़ी में इसका संरक्षण भी जरूरी है। हमें अच्छा लगता है कि हम इस परंपरा से जुड़े हैं। आम तौर पर सुआ नृत्य दिवाली में किया जाता है लेकिन हमारे गांव में गणेश विसर्जन पर ही इसका खास रिवाज चला आ रहा है।

पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही नृत्य की परंपरा

ग्रामीण सोम प्रकाश साहू, जवाहर लाल मंडावी, सांवत राम बर्मन, हेमसिंग बर्मन, बुजुर्ग डोमार ठाकुर, रेवा रमन ठाकुर ने बताया पीढ़ी दर पीढ़ी ये परंपरा चली आ रही। बुजुर्ग जो निभाते आए थे उसे भी हम निभा रहें हैं। विसर्जन पर गणपति महराज को खुशी खुशी विदाई देने के लिए ये सुआ नृत्य किया जाता है। इसके पीछे कोई विशेष कारण तो नहीं है लेकिन सुआ नृत्य को विसर्जन के दिन करने की एक परंपरा बुजुर्गों ने बना दी है जो आज भी चली आ रही है। शुक्रवार को विसर्जन पर गांव की महिलाओं ने सुआ नृत्य कर गणेश जी को विदाई दी।

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