
कण-कण में शिव है, शिव ही गुरु, गुरु ही शिव है,,,,,
बालोद। मंगलवार को अंतिम दिन की कथा सुबह 8 से 11 बजे तक हुई। जिसमें शामिल होने लोग सुबह चार बजे से पहुंचना शुरू कर चुके थे। पंडित मिश्रा ने कहा आज के काल में लोग दूसरे को बदलने में लगे है। हम कहें आप दुनिया को बदलने का प्रयास कर रहे हो। हम आपसे पूछते हैं आप कितने बदले। जब हम खुद अपने आप को नहीं बदल सकते तो ऐसे बात क्यों करते हैं। प्रवचन देना कहना बोलना बड़ा सरल है। आपने आपको बदलना कठिन है।

दूसरे को ज्ञान देना, समझाना सरल है पर अपने आपको समझाना और खुद पर अमल करना बहुत कठिन है। बालोद में महेश्वरी समाज ने दस बारह साल पहले कथा करवाया था। महेश्वरी समाज को मैं धन्यवाद देता हूं। जिन्होंने कथा का स्मरण कराया। 15 साल पहले बीज लगाकर गए थे। आज वह पेड़ बनकर फल देने लगा। जिसने शिव पुराण को अपनी जिंदगी में उतारा हो वह भागवत कहे तो जीवन में वो चीज असर करती हैं। घर में रहने वाली बेटा बहु जब कहीं प्रसिद्ध नही होता वह घर में समय देता है पर जब वह किसी पद पर जाता है तो समय नहीं दे पाता। जैसा आपके साथ होता है वैसा एक संत साधु तपस्वी भक्ति में डूबने वाले के साथ भी होता है। ट्रेन का काम है मंजिल तक पहुंचाना। हमारे शिव को गुरु और गुरु को शिव माना गया है। किसी की वाणी सुनकर आपका दिन या रहने का तरीका बदला, मंदिर जाना शुरू कर दिए हैं, भगवान की कृपा बरस रही है तो मान लेना गुरु ही शिव, कृष्ण नारायण ब्रम्हा है। द्रोणाचार्य द्रौप्ती संवाद का जिक्र करते कहा कि कोई किसी का साथ नही देता। गुरु मंत्र जपो मंजिल तक चली जाओगे। जो दावा करते है कि आपका दुख कांट सकते हैं समझ लेना वे असली गुरु नही हैं। असली गुरु एक ही बात कहेगा ये दुख जीवन में जरूर आयेगा। मानव जीवन में ये स्वाभाविक है। महादेव के द्वार जाओ एक लोटा जल चढ़ाओ।
भगवान से जुड़िए ऐसा पद मिलेगा, सोच भी नहीं सकते

एमपी, छग राजस्थान में चुनाव की तैयारी है। कितने लोग आगे पीछे घूम रहे हैं पैर पकड़कर हमारा टिकट कह रहें ,,,,, वह भी मात्र पांच साल कुर्सी पाने के लिए। एक बार मेरे महादेव के चरण पकड़ लेंगे तो जीवन भर की सत्ता मिलती है। इत्र की तरह शिव भक्ति करो। कोई आस मत करो। देने वाला विश्वनाथ है। जिसने शंकर के मंदिर में चार चांद लगाए हैं भगवान उनके जीवन में चार चांद लगा देंगे। ज्यादा प्रसिद्धि होने पर भगवान का भजन छूट जाता है। जीतने रोग तकलीफ आते हैं वह पूर्व जन्म के कारण होता हैं। शंकर का दरवाजा मत छोड़ो।

शंकर हमेशा रहते हैं। सब युग में हैं। चंद्रयान चांद पर गया है वहां भी कंकर है तो शंकर है। वे अपने भक्त का इंतजार करते हैं कि वे मुझे पुकारे।
पार्वती को कई लोगों ने समझाया कि भोले से स्नेह मत करो। वह नही मानी। इसलिए आपको भी शिव भक्ति से पीछे नहीं हटना है। चाहे कोई कितना भी मना करें। एक कण कण में शिव है।

जीवन में आए है तो रोना पड़ेगा अंत तक। मुस्कुराने के लिए तो शिव महापुराण है। कुंभकरन के बेटे भीमा जैसे देवालय मूर्तियां खंडित करने का प्रयास कुछ लोग करते हैं मैं ऐसे लोगों को कहता हूं आप कोई मूर्ति नही बैठा सकते तो तोड़ो भी मत। कुबेश्वर धाम में कंकड़ शंकर की पूजा करके स्थान बनाओ। जब मनुष्य देह का भगवान से टावर मिले तो भगवान की कृपा है।
शिव को झूठ और जूठा पसंद नही

पंडित मिश्रा बोले पानी हमारे शरीर को लगता है तो वह नाली गटर में चला जाता है। लेकिन पानी भगवान से लग जाता है वह तुलसी की क्यारी, पेड़ पौधे में जाता है। नाली गटर में नहीं जाता। वह पानी कभी बेकार जगह पर नहीं जाता। इस तरह जो शिव और शिव पुराण से, भगवान से लग जाता है वह भागवत के धाम चला जाता है। भगवान भोलेनाथ जी को दो चीज पसंद नहीं है। झूठ बोलना और जूठा देना। झूठ और जूठा दोनों उन्हें पसंद नहीं है। कभी झूठ मत बोलो और शंकर जी के मंदिर में जब जल चढ़ाने जाओ तो जल को कटोरी या कोई बर्तन से लेकर पियो। तुरंत शिवजी पर जल चढ़ाएं और उनकी धार को पीने से वहां जूठा हो जाता है। ऐसा ना करें। भगवान ऐसे भक्ति भजन को स्वीकार नहीं करते। जिस तरह पोलियो की दो बूंद की दवाई आपको विकलांग नहीं होने देता। इस तरह शंकर पर चढ़ा हुआ जल का दो बूंद हमारे मन को कभी विकलांग नहीं होने देता। शिव पर चढ़ा दो बूंद हमारे जीवन की सार्थकता सिद्ध करते हैं। मंदिर जाओ तो हाथ और मुंह जूठा नहीं होना चाहिए। कई लोगों के मुख में तंबाकू गुटखा खैनी भरा होता है और भगवान की सेवा करते हैं। वह श्रेष्ठ नहीं है। मुख में खाते-खाते सेवा करना श्रेष्ठ नहीं है। जब तक हम मंदिर में रहे ना हम झूठ बोले ना कोई जूठा करें। एक विश्वास दृढ़ता भक्ति भरोसा आपके अंदर होना चाहिए।
गलती मुझसे भी होती है,,,,

पंडित मिश्रा ने कहा मैं कहता हूं गलती करो पर एक बार जो गलती कर दिए उसे दुबारा मत करो। उससे सीखो की क्या खोया क्या पाया? मनुष्य गलती का पुतला है। कोई ऐसा नहीं जो गलती नही किया हो। अपनी गलती स्वयं मानो। भरोसा और भक्ति बढ़ाते चलो। कथा के अंत में उन्होंने समस्त सनातनी लोगों को रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दी और सभी से हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए मंच से विदा लिए।
