मइया यशोदा दधि मंथन करने कमर कस ली है -कमर कसना का अर्थ है आलस्य और प्रमाद का विसर्जन -संतनिरंजन
बालोद। शारदा कॉलोनी स्थित आमापारा आमा बगीचा में चल रहे श्रीमद् भागवत महापुराण के सातवें दिन भागवत आश्रम लिमतरा से पधारे पूज्यपाद संत निरंजन महाराज ने ब्रज लीला, कंस वध ,रुक्मणी विवाह प्रसंग को अपने व्यासपीठ से विस्तार देते हुए कहा कि मछली जल के बिना जीवित नहीं रह सकती ,जब उसे बाहर निकाल दिया जाए तब कुछ क्षण जीवित रहती है ,अंततः वह तड़प तड़प कर मर जाती है। लेकिन जीव परमात्मा के बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता क्योंकि जीव परमात्मा का अंश है ।वृंदावन की गोपियां निरंतर अपलक, अहर्निश ,परमात्मा का चिंतन करती है ।यद्यपि वह संसारिक कार्यों में संलग्न है लेकिन मन ,वचन ,कर्म से उनका ध्यान श्री कृष्ण में संलग्न है ।निरंतर ध्यान ही गोपियों का कर्मयोग है। गोपियां साध्वी तपस्विनी नहीं बनना चाहती। उनके जीवन में अलग से वैराग्य नहीं है। बल्कि निरंतर श्री कृष्ण का चिंतन में रहना ही विशुद्ध गोपी भाव है। गोपी निरंतर श्याम का चिंतन करते करते श्याम बन गई है। स्वामी जी ने श्रीमद्भागवत में दधि मंथन कथा को विस्तार देते हुए कहा कि मइया यशोदा दधि मंथन करने अपने कमर को कस ली है ।कमर कसना का अर्थ है आलस्य और प्रमाद का विसर्जन है। इस भाव संचेतना में यशोदा साधक, दधि मंथन साधन और भगवान श्री कृष्ण साध्य है ।यही कर्म साधना श्री ठाकुर जी की सच्ची पूजा है ।परमात्मा जागृत स्वप्न और तुरीय तीनों अवस्था में सदा जागृत है। मइया यशोदा श्री कृष्णा के को दूध पिला रहे हैं और कन्हैया वात्सल्य भाव से दुग्ध पान कर रहे हैं। संत प्रवर ने कहा कि संसार में आसक्ति होने पर जीवन दुख प्रद है मन की निर्लिप्त भाव में जगत आनंदमय है।पांच ज्ञानेंद्रियों पांच कर्मेंद्रिय तथा मन से ऊपर उठ जाना गोपी भाव है। गोकुल की गली अति सकरी है जिसमें दो नहीं समा सकता ।वह तो प्रेम गली है जिनमें परमात्मा ही अद्वैत है। गोवर्धन लीला के कथा सूत्र को विस्तार देते हुए स्वामी जी ने कहा कि गोमाता के चरणों में परमात्मा निवास करते हैं। गो संस्कृति और वन संस्कृति ,गौ संवर्धन तथा पर्यावरण का संरक्षण भारत का प्राणवंत संस्कृति है। जिसके संरक्षण और संवर्धन के लिए भगवान श्री कृष्ण ने वृंदावन में ग्यारह वर्ष तक दिव्य और अलौकिक लीला संपादन किए ।श्रीमद्भागवत गीता में गायों को उपनिषद कहा गया है ।स्वामी जी ने अपने व्यासपीठ से वन संपदा, पर्यावरण ,पेड़ लगाने, नदियों को सुरक्षित रखने तथा गाय पालने का संदेश दिया ।श्री स्वामी जी ने कहा कि श्रीकृष्ण विश्व के सबसे बड़ा पर्यावरणविद है ।जिन्होंने इंद्र पूजा का विरोध कर ब्रज वासियों को पेड़ पौधे नदी,वन और पर्वतों से जोड़कर प्रकृति पूजा की ओर आकृष्ट किया ।स्वामी जी ने कहा कि यही हमारी सनातन संस्कृति है जिसके बिना अखिल जगत का जीवन संभव नहीं है ।कंस वध की कथा कहते हुए स्वामी जी ने कहा कि भारत अहिंसा की धरती है । हमारी संस्कृति में हिंसा उत्पाद अपराध और धर्म का कोई स्थान नहीं है ।श्री कृष्ण वृंदावन में बांसुरी बजाते हैं लेकिन कुरुक्षेत्र में चक्र सुदर्शन भी उठाते हैं ।श्री कृष्ण शांति और युद्ध के अप्रतिम योद्धा है। कथा श्रवण करने श्रद्धालुओं की भीड़ देखी जा रही है।
