श्रीमद्भागवत मृत्यु में जीवन का यथार्थ विशेषण है- संत निरंजन
बालोद। नगर के आमापारा बालोद के आमा बगीचा मे चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ के षष्टम दिवस भागवत आश्रम लिमतरा से पधारे पूज्यपाद निरंजन महाराज ने श्रीमद् भागवत की कथा यात्रा में व्यासपीठ से भगवान श्री कृष्ण के जन्म एवं बाल लीला का वर्णन करते हुए कहा कि श्री कृष्ण जन्म को श्रीमद्भागवत में भागवत का प्राण तत्व कहा गया है ।मानस की पंक्ति को आधार देते हुए स्वामी जी ने कहा कि जब तक धर्म की हानि होती है अधर्म, अत्याचार, दुराचार बढ़ने लगता है। तब परमात्मा धरा धाम में अवतरित होते हैं। भगवान श्री राम और श्री कृष्ण, रावण और कंस का वध करने ही नहीं आए अपितु परमात्मा संसार में हो रहे दुराचार व ब्राह्मण ,साधु-संतों की रक्षा के अखिल जगत के कल्याण के लिए परमात्मा अवतरित होते हैं ।वे असत्य का नाश कर सत्य को स्थापित करते हैं । स्वामी जी ने श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में भगवान श्री राम के प्राकट्य के माधुर्य को बताते हुए कहा कि भगवान श्रीराम लोक हितैषी की संपत्ति है ।

संसार में श्री रामचरितमानस जैसे ग्रंथ नहीं है । श्री राम जैसे पुत्र ,दशरथ जैसी पिता, कौशल्या ,सुमित्रा ,कैकई जैसे माता, लक्ष्मण जैसे अनुरागी, भरत जैसे त्यागी ,सीता जैसी सती नारी ,श्रीराम का सील सौंदर्य और मर्यादा ,केंवट जैसे सखा, अंगद हनुमान जैसे अप्रतिम भक्त ,राजा जनक जैसे संमधी अन्यत्र दुर्लभ है। महाराज श्री छत्तीसगढ़ महतारी की प्रशंसा करते हुए कहा कि यही छत्तीसगढ़ की पावन माटी है जो माता कौशल्या की जन्मभूमि है जिनके पावन कोख से अखिल ब्रह्मांड नायक पूर्ण परात्पर ब्रह्म श्री राम अवतरित होते हैं ।यह दंडकारण्य की पवित्र भूमि है जहां भगवान के वनवास का सर्वाधिक समय छत्तीसगढ़ में बीता।

इसलिए सहजता ,सरलता, प्रेम की निर्मलता की पवित्र भूमि को हम छत्तीसगढ़ महतारी कह कर पुकारते हैं। श्री कृष्ण की कथा को विस्तार देते हुए स्वामी जी ने कहा कि जो अखिल ब्रह्मांड के कण-कण में विराजित है वही वासुदेव है। जो पांच ज्ञानेंद्रियों पांच कर्मेंद्रियों, मन ,बुद्धि, चित्त अहंकार से परे हैं वही देवकी है। जिसके जीवन में क्रूरता है वही कंस है ।वितराग महापुरुष श्री सुकदेव महाराज परीक्षित से कहते हैं कि मौत कब आ जाए कोई नहीं जानता। आया हुआ मौत टल जाता है और टला हुआ मौत आ जाता है ।श्रीमद्भागवत तो मृत्यु में जीवन का यथार्थ विश्लेषण है। देवकी के आठवें गर्भ से श्रीकृष्ण अवतरित होते हैं तब ब्रह्मांड की सारी शक्ति अलौकिक आभा से प्रकाशित हो उठती है। बड़ी संख्या में पधारे भक्त कथा रस माधुर्य का आनंद ले रहे हैं।
