अजब-गजब परंपरा- बालोद के इस गांव में गणेश विसर्जन के साथ ग्रामीणों ने किया भोजली का भी विसर्जन, मां काली की निकली झांकी



बालोद। आमतौर पर आप भोजली विसर्जन का रिवाज नवरात्रि में सुनते होंगे। जब जोत जंवारा का विसर्जन होता है। लेकिन बालोद जिले में एक गांव बोरी(लाटाबोड़) ऐसा भी है। जहां पर गणेश विसर्जन के दिन भोजली जंवारा का भी विसर्जन किया जाता है। दरअसल में इस दिन बकायदा ग्रामीणों द्वारा मां काली की झांकी भी निकाली जाती है। क्योंकि काली (शीतला)मंदिर में ही जंवारा तैयार की जाती है। फिर उसका गणेश विसर्जन के दिन विसर्जन किया जाता है। जिस दिन गणेश की स्थापना होती है उसी दिन से भोजली बोने की परंपरा निभाई जाती है। फिर 11 दिनों तक भोजली तैयार होती है। जिसे फिर विधिवत ग्रामीण गांव में शोभायात्रा निकालकर विसर्जन करते हैं। यह परंपरा वर्षो (कई पीढ़ी) से चली आ रही है। इसके पीछे विशेष क्या मान्यता है यह ग्रामीण पूरी जानकारी नहीं बता पाते हैं। लेकिन पूर्वजों से बनाई परंपरा को आज की पीढ़ी भी निभा रही है। और यही वजह है कि इस साल भी बिना किसी सवाल के आज की पीढ़ी गणेश विसर्जन के दिन भोजली विसर्जन करती है। काली मां की झांकी निकालने का विशेष रिवाज है। जो आकर्षण का केंद्र रहता है। इस नजारे को देखने के लिए बोरी सहित आसपास के ग्रामीण भी यहां पहुंचते हैं। बालोद जिला मुख्यालय से किमी दूर सेमरिया नाला के किनारे ये गांव बसा है। गणेश विसर्जन के पश्चात समस्त ग्रामवासी के सहयोग से हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी कंकालीन माता जवारा विसर्जन के साथ आकर्षक झांकी भी निकाली गई। गांव में यह परंपरा पूर्वजों से चली आ रही है। जिसे आज भी बोरी गांव में छत्तीसगढ की संस्कृति को निरंतर जारी रखा गया है। इस आयोजन में प्रमुख रूप से सरपंच भूपेंद्र कुमार, नारद सेन, कुंजन चौरे, दिलीप साहू, मनराखन निषाद, पोषण साहू, पारख, दुष्यंत साहू, सोहन साहू, रोमन,गांव के बैगा रामनाथ ठाकुर, ज्ञान सिंह,एवम समस्त ग्रामवासियों का विशेष सहयोग रहा।

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