फादर्स डे विशेष – गरीबी से उठकर आगे बढ़े और कई गरीब बच्चों का जीवन संवारने बनाई छात्रावास, देते रहे पिता की तरह पनाह, इसलिए तो हर कोई उन्हें कहता है “बालोद का बापू”



बालोद(छग)- ( ये खबर कवि व साहित्यकार कोहंगाटोला के डॉ अशोक “आकाश” साहू ने dailybalodnews.com के लिए लिखी है)  –    

आज 20 जून फादर्स डे पर हम बालोद के बापू के नाम से अपनी पहचान बनाने वाले अमृत दास का जीवन परिचय बता रहे हैं जो आपको प्रेरित करेगी. खुद गरीबी से उठकर गरीब बच्चों को अपने छात्रावास में पनाह देकर इस बापू ने कई छात्रों का भविष्य संवारा है तो वहीं उनके पढ़ाए बच्चे आज देश के कई कोने व हर क्षेत्र में लोहा मनवा रहे हैं. तो आइये पढ़ते हैं उनके जीवन की अनूठी संघर्ष से भरी कहानी ,,,,,,,,,,,

अमृत दास “दास” जी का जन्म 21अगस्त 1931 को दुर्ग जिला के धमधा के निकट ग्राम देवरी में हुआ | किसान परिवार में पिता फगुवा दास मानिकपुरी मॉ इंदिया बाई की चार बेटियों के बाद जन्मे यह छोटे से लाल अपनी काबीलियत के दम पर बड़ा काम कर जायेगा यह किसी ने सपने में भी नही सोचा रहा होगा | जब ये मात्र दो वर्ष के हुए इनके पिताजी का आकस्मिक निधन हो गया जिससे इनके परिवार में भारी रिक्तता और असमंजस का वातावरण बन गया भविष्य की अनिश्चितता मुंह बायें खड़ी थी तब इनकी मॉ इंदिया बाई ने अटूट आत्मविश्वास के साथ अस्तित्व की लड़ाई में अदम्य साहस का परिचय दिया, दास जी के जीवन में इनकी मॉ एवं इनकी सभी बहनें की त्याग तपस्या का बड़ा योगदान रहा, जो खुद अनपढ़ होते हुए आपको पढ़ाई को लिये लगातार प्रेरित करते रहे |

आपकी प्राथमिक शिक्षा ग्राम देवरी में ही हुई, शिक्षा के प्रति आपका शुरू से ही गहरा लगाव रहा, हिंदी एवं गणित आपके प्रिय विषय रहे | खेल के क्षेत्र में खो खो के आप जाने माने खिलाड़ी रहे हैं इसके अतिरिक्त आप कबड्डी के मैदान में अपनी विशिष्ट खेल के लिये जाने जाते थे | हर सफल व्यक्ति की जिंदगी में कोई न कोई प्रेरक होता ही है जिनकी प्रेरणा से जिंदगी संवरती जाती है , ऐसे ही आपकी जिंदगी में आपके गुरुवर पं.काशी प्रसाद दुबे जी का बड़ा योगदान रहा जिनके मार्गदर्शन से आपने सफलता के सोपान तय किये |

आपका बचपन अभाव में गुजरा , आजादी के पूर्व आपने मिडिल स्कूल धमधा से सातवी बोर्ड का परीक्षा पास की | अंग्रेजों के शासनकाल में उनके अधीन स्कूल में पढ़ते “वंदे मातरम् ” का गायन करना आपको गौरव की अनुभूति कराता था | “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा ” आजादी के बाद आपके लिये गौरव गीत की तरह था तभी तो आप इसे गुनगुनाते राष्ट्रभक्ति की अविरल धारा में हमेशा बहते रहते थे |सातवीं की बोर्ड परीक्षा पास करने के पश्चात आपका चयन नार्मल स्कूल बालाघाट में दो वर्षीय शिक्षक प्रशिक्षण हेतु हो गया , उक्त प्रशिक्षण प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने के पश्चात पूर्व माध्यमिक शाला धमधा में शिक्षक के रूप में आपकी प्रथम नियुक्ति हुई जहॉ आपको कक्षा पहली के बच्चों को पढ़ाने का दायित्व मिला | दो वर्ष बाद आपने कक्षा ग्यारहवीं बोर्ड की परीक्षा अंग्रेजी विषय के साथ स्वाध्यायी छात्र के रूप में दिलाया यह परीक्षा अच्छे अंक से उत्तीर्ण होने के बाद आपका आत्मविश्वास और भी दृढ़ हुआ | आप जीवन भर आदर्श शिक्षक तो थे ही आदर्श विद्यार्थी की तरह शिक्षा ग्रहण करने सदैव तत्पर रहे | आप स्वाध्यायी छात्र के रूप में अंग्रेजी विषय में बी. ए. , साहित्य विशारद , रामायण उत्तमा के दोनो खंड अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए | प्रतिभा के अनुरूप शिक्षकीय जिम्मेदारी न मिलने से आपको बड़ी निराशा लगी लेकिन आपने आत्मविश्वास नही खोया उसी तरह पहली कक्षा के बच्चों को पढ़ाने का दायित्व निर्वहन करते रहे | समय अनुरूप स्थानांतरण के साथ आप धमधा दुर्ग बेमेतरा गोढ़ी में शिक्षकीय कार्य करते रहे |

अमृत दास “दास” गुरुओं के गुरू       

      

आपकी दो शादियॉ हुई प्रथम वैवाहिक जीवन सफल नही रहा, आपकी द्वितीय शादी ग्राम गुजरा तहसील पाटन जिला दुर्ग निवासी अनुप दास मानिकपुरी की पुत्री सरोज के साथ हुई जहॉ से आपने सफलता और आत्मविश्वास से भरा ऊड़ान प्रारंभ किया | सरकार द्वारा आपकी प्रतिभा के अनुरूप शिक्षकीय जिम्मेदारी न देने से आपने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और स्वाध्याय के समर में कूद पड़े | दो वर्ष तक बेमेतरा प्राइवेट हाई स्कूल में हिंदी और अंग्रेजी के शिक्षक रहे , फिर नगरपालिका दुर्ग द्वारा संचालित स्कूल में आपकी नियुक्ति हुई जहॉ आपने बच्चों के मनोविज्ञान को समझा और समयानुरूप शिक्षण शैली में बदलाव के लिये कुछ नया करने की तीव्र ललक लिये पुनः इस्तीफा दे आप फिर से प्राइवेट स्कूल बेमेतरा में अध्यापन कार्य करते रहे | इस दौरान उक्त निजी शाला शासन के अधीनस्थ होने के साथ शासकीय शिक्षक के रूप में आपका भी चयन किया गया |

बालोद से इस तरह जुड़ा रिश्ता, अब तक अटूट

बालोद का सौभाग्य रहा कि आपका स्थानांतरण शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बालोद हुआ जहॉ सहायक शिक्षक पद में नियुक्ति के साथ आदिवासी छात्रावास अधीक्षक के रूप में अतिरिक्त प्रभार लिये आपने 1 जुलाई 1961 को पदभार ग्रहण किया | मन में गुंजरित विपन्न आदिवासियों के दुख, सुविधा के अभाव में विलुप्त होती इनकी प्रतिभा, निरीह बेबस भोले आदिवासियों के हृदय में उभरे दर्द के ज्वार भाटे एवं उनके अंतर्द्वद्व को किसी कुम्हार की तरह ठोस आकार देने का पुण्य कर्म अब आपके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका था | कड़े अनुशासन में आपके बच्चे अब जीवन संग्राम में जूझने की योग्यता साबित करने लगे | आपकी छात्रावास में पढ़ने वाले गरीब आदिवासी बच्चे प्रवीण्य सूचि में स्थान बनाकर आपकी मेहनत सफल करने लगे | प्रकृति प्रेम, रोजगारोन्मुख शिक्षा के ध्येय ने छात्रावास से लगी ढाई एकड़ बंजर भूमि को सुंदर उपवन में परिवर्तित कर दिया | मध्यप्रदेश राज्य शासन के तत्कालीन शिक्षा मंत्री गोपाल राव पवार तक ने आपको पत्र लिखा एवं शासन का सहयोग सीधा आपके कार्यक्षेत्र तक पहुंचाने का आश्वासन दिया इसी वर्ष आपको राज्यपाल सम्मान से सम्मानित किया गया | समाज हित में अनेक रचनात्मक कार्य से आपकी कीर्ति उत्तरोत्तर उन्मुख होती रही | अभावग्रस्त गरीब असहाय माता पिता के होनहार बिरवानों को सहेजने का क्रम जारी रहा | आर्थिक विपन्नता लाचारी भुखमरी से जूझते नुन तेल लकड़ी के चक्रव्यूह में दम तोड़ते लोगों को जाति वर्ग धर्म के भेद से दूर होकर सर्व जाति के लिये छात्रावास निर्माण आपका एकमात्र लक्ष्य हो गया |

जरुरतमन्द बच्चों के अकिंचन छात्रावास निर्माण का सपने भी पूरा हुआ

पं. मदन मोहन मालवीय की विचार धारा से प्रेरित दास जी ने उन्हीं के नाम से पं.मदन मोहन मालवीय शिक्षण समिति के गठन किया और इसके प्रथम अध्यक्ष बालोद नगर सेठ भोजराज श्री श्रीमाल को बनाया गया, श्री किशन गोयल, तत्कालीन अनुविभागीय अधिकारी सारथी जी, तत्कालीन हाई स्कूल प्राचार्य अर्जुन सिंह साव सहित बालोद के प्रतिष्ठित नागरिक अधिकारी कर्मचारी सबका यथायोग्य सहयोग मिलता रहा | दानदाता तिलोकचंद द्वारा भूमिदान एवं 1001 रुपये नगद राशि दान से स्व. गुमानी राम तिलोक चंद्र अकिंचन छात्रावास निर्माण के सपने का लक्ष्य पूर्ण हुआ | 17नवंबर 1979 को तत्कालीन दुर्ग कलेक्टर आनंद कुमार भट्ट द्वारा छात्रावास भवन निर्माण का शुभारंभ किया गया | इसके बाद आपके सपने को नई दिशा मिली और आप दूरस्थ ग्रामीण अंचल में त्याग तपस्या समर्पण की प्रतिमूर्ति के रूप में जाना जाने लगे |

हर उम्र में जज्बा कायम

गरीब खेतिहर मजदूर असहाय विधवा एवं भिखारी के बच्चों को मुफ्त शिक्षा एवं छात्रावास की अन्य व्यवस्था के लिये इस कर्मवीर को बालोद की संकरी गलियों एवं सड़कों में छाता और झोला लिये बेहद तेज कदमों से कड़क धूप, बर्फीली ठंड और झमाझम बारिश में पैदल चलते देख कर सभी बालोद वासी श्रद्धा से भर उठते थे | सरदार सुरजीत सिंह भाठिया, गुलबीर सिंह भाठिया , चावल मिल मालिकों, जैन महिला मंडल, जैन सुलसा मंडल, माहेश्वरी मंडल सहित असंख्य समाज सेवियों द्वारा अनवरत सहयोग मिलता रहा | अब तक आपकी छात्रावास से लगभग दो से ढाई हजार बच्चों को निःशुल्क शिक्षा एवं छात्रावास की सुविधा प्रदान की जा चुकी है |

ऐसे शुरुआत हुई कबीर मंदिर की

शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त से पूर्व सन् 1991 में आपने 10 लाख की लागत से कबीर दर्शन मंदिर की आधारशिला रखी और प्रति वर्ष सत्य अहिंसा एवं सामाजिक सौहाद्रता के प्रतीक संत कवि कबीर दास जी की जयंती मनायी जाती है, जिसमें अंचल के धर्म प्रेमियों, कलाकारों , साहित्यकारों, एवं आसपास के सत्संग प्रेमी लोगों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रहती है | आप उच्च स्तर के कवि होने के साथ अच्छे लेखक भी हैं, आपके सम्पादन में “कौमी एकता के प्रथम मसीहा कबीर दास ” नामक पुस्तक का प्रकाशन भी हुआ है | ग्रीष्मकालीन अवकाश में स्कूली बच्चों को आपके द्वारा मुफ्त ट्यूशन की व्यवस्था की जाती है और अभिभावक आपके पास अपने बच्चों को मार्गदर्शन हेतु लेकर आते हैं और भविष्य के उज्जवल मार्ग आपके द्वारा दिखाया जाता है | बालोद में साहित्यिक आयोजन जैसे कवि गोष्ठी, कवि सम्मेलन जैसे साहित्यिक गतिविधियों में आपका सतत सहयोग एवं सक्रिय भागीदारी रहती है |

इनके पढ़ाए लाल, यहां किए कमाल

आपके द्वारा शिक्षा प्राप्त किये छात्र भीषम लाल ठाकुर IAS अफसर के रूप में सेवा देकर सेवानिवृत्त हो चुके हैं तो डॉ. आनंद देशपॉडे नेत्र रोग विशेषज्ञ के रूप में विदेश में सेवा दे रहे हैं, इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के वरिष्ठतम् साहित्यकार डॉ. परदेशी राम वर्मा , मुकुंद कौशल, बालोद के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रदीप जैन, डॉ. महेश्वर, राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग के राष्टीय सदस्य यशवंत जैन , पी. आर नायक जैसे सफल अधिकारी कर्मचारी चिकित्सक राजनेता साहित्यकार की बड़ी लंबी सूची है जिन्हें आपने हीरे की मानिंद तराशा है जो अंचल का नाम गौरवान्वित कर रहे हैं | मैं (अशोक साहू) गौरवान्वित हूं जो मुझे भी आपका छात्र होने का गौरव प्राप्त हुआ है और आपका वरद हस्त हमेशा मिलता रहा है | 90 वर्ष की लंबी उम्र में अस्वस्थता के बाद भी आप साहित्य एवं समाज सेवा के लिये कृत संकल्पित हैं |

ये सम्मान मिला आपको

राष्ट्रपति सम्मान, राज्यपाल सम्मान, छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2011 पं.रविशंकर शुक्ल सम्मान, समाज रत्न पति राम साव सम्मान , मधुर साहित्य गौरव सम्मान, तेजराम मढ़रिया स्मृति अगासदिया सम्मान आदि

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