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आखिर कौन है 40 लाख का इनामी नक्सली हिड़मा जिसने रची बीजापुर में हमले की साजिश, हिड़मा है 23 जवानों की हत्या का मास्टरमाइंड, जानिए इसके बारे में

बीजापुर। बीजापुर के तररेम थाना क्षेत्र के जंगलों में हुई मुठभेड़ में 23 जवान की शहादत के बाद एक बार फिर छत्तीसगढ़ दहल गया है। तो वही सरकार अब नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देने की तैयारी कर रही है। तो इस घटना की समीक्षा भी जोर शोर से हो रही है कि आखिर कहां चूक हुई कि इतनी बड़ी घटना हो गई ।तो वही इस बड़ी घटना का मास्टरमाइंड एक बार फिर नक्सली हिड़मा के होने की बात सामने आई है। जिस पर अलग-अलग क्षेत्र में 25 लाख से ₹40 लाख तक का इनाम घोषित है। जिसे पकड़ना व जिसका खात्मा पुलिस के लिए भी चुनौती बनी हुई है। 2 दिन पहले हुई बीजापुर की इस ह्रदय विदारक घटना में 23 जवानों की हत्या के पीछे मास्टरमाइंड हिड़मा ही है।

25 से 40 लाख का इनामी है नक्सली


घटना के मास्टरमाइंड का नाम माड़वी हिडमा है। पुलिस ने इस पर 25 से 40 लाख का इनाम घोषित किया है। नक्सल कमांडर माड़वी हिडमा को संतोष उर्फ इंदमुल उर्फ पोडियाम भीमा जैसे कई नामों से भी जाना जाता है। यह छत्तीसगढ़ पुलिस समेत कई नक्सल प्रभावित राज्यों के पुलिस के लिए मोस्टवांटेड नक्सली है।

बीते एक दशक में यह सबसे बड़ा नक्सली हमला है।

25 मई 2013 को सुकमा के झीरम घाटी में नक्सलियों ने कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला किया था। इस हमले में कांग्रेस के तात्कालिक प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, विद्या चरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा समेत सुरक्षा में तैनात 29 लोगों की मौत हुई थी। 3 अप्रैल को घटी इस घटना ने एक बार फिर उस हमले की याद ताजा कर दी।

सुकमा का रहने वाला है नक्सली हिडमा
बताया जा रहा है कि शनिवार को सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ की घटना हिडमा के गांव पूवर्ती के आसपास में ही घटी है। छत्तीसगढ़ का सुकमा जिला हिडमा का गढ़ है, जहां पर होने वाली सभी नक्सली गतिविधियों को हिडमा संचालित करता है। कद काठी में दुबले पतले हिडमा का नक्सली संगठनों में कद काफी बड़ा है। हिडमा नक्सली गतिविधी और संगठन पर अच्छी पकड़ के कारण ही सबसे कम उम्र में माओवादियों की टॉप सेंट्रल कमेटी का सदस्य बन गया है।

हिडमा के गांव में बनती है नक्सल गतिविधियों की नीति और रणनीति

छत्तीसगढ़, झारखंड, आंध्रप्रदेश समेत कई राज्यों में नक्सली हमलों को अंजाम देने वाले खूंखार नक्सली हिडमा का जन्म सुकमा जिले के पुवर्ती गांव में हुआ था। इस गांव में पहुंचने के लिए आज भी ना तो सड़कें हैं और ना ही कोई अन्य सुविधा। आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि राज्य गठन के दो दशक बाद भी इस गांव में स्कूल तक नहीं है। यह गांव दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा हुआ है।आज भी नक्सलियों की जनताना सरकार की तूती बोलती है। बताया जाता है कि नक्सल गतिविधियों को अंजाम देने के लिए सभी नीति और रणनीति यहीं पर तैयार होती है और फिर उस घटना को अंजाम दिया जाता है।

हिड़मा है सबसे खतरनाक

दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के मिलिट्री विभाग का प्रमुख माड़वी हिड़मा बस्तर का सबसे दुर्दांत नक्सली माना जाता है। जोनल कमेटी के सचिव रमन्ना की मौत के बाद वह सचिव के पद की दावेदारी में शामिल रहा। 2013 में झीरम में कांग्रेस के काफिले पर हमला, 2017 में बुरकापाल में सीआरपीएफ के 25 जवानों की हत्या समेत कई बड़ी वारदातों का मास्टरमाइंड उसे माना जाता है। बस्तर में नक्सलियों की दो बटालियन हैं जिनमें पहली बटालियन का कमांडर वही है। दूसरी बटालियन अबूझमाड़ में सक्रिय है। टीसीओसी में बड़ी वारदातों की रणनीति बनाने और उसे क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी हिड़मा को ही दी गई है।

इधर खुफिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि इस घटना की प्लानिंग की जानकारी नईदिल्ली तक थी। दरअसल तर्रेम नक्सलगढ़ का वह छोर है जहां तक पहुंचना बड़ी बात है। फोर्स ने वहां कैंप खोलकर उन्हें खुली चुनौती दे दी है। अब इससे भी आगे सिलगेर में कैंप खोलने की तैयारी चल रही है। अपने इलाके में फोर्स के बढ़ते दबदबे से बौखलाए नक्सली किसी भी कीमत पर पलटवार करने पर आमादा हैं। ऐसे इलाके में नक्सली जमावड़े की सूचना मिलते ही एक्शन लेने की जरूरत थी। सूत्र बताते हैं कि नक्सल अभियान की प्लानिंग रायपुर व दिल्ली के स्तर पर बन रही है। यही वजह है कि सूचना मिलते ही कोई एक्शन नहीं लिया जाता है और नक्सलियों को मौका मिल जाता है। बीजापुर में भी यही हुआ। इनपुट मिलने के पांच दिन बाद जब फोर्स निकली तो नक्सली तैयार बैठे थे।

10 वी पढा पर अंग्रेजी बोलता है

बताते हैं कि हिडमा सिर्फ दसवीं क्लास तक पढ़ा है, लेकिन पढ़ने-लिखने में रूचि होने के कारण वह फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोल लेता है. बताया जाता है कि हिडमा अपने साथ हमेशा एक नोटबुक लेकर चलता है, जिसमें वह अपने नोट्स बनाता रहता है. हिडमा की पहचान को लेकर कहा जाता है कि उसके बाएं हाथ में एक अंगुली नहीं है, यही उसकी सबसे बड़ी पहचान है.

पहले भी कई बड़े नक्सली हमलों को दे चुका है अंजाम

हिडमा साल 1990 में माओवादियों के साथ जुड़ा. लेकिन कुछ ही सालों में यह नक्सली संगठनों का एक बड़ा नाम बन गया. हिडमा की नेतृत्व करने और सटीक रणनीति बनाने की प्रतिभा ने उसे बहुत जल्द शीर्ष नेतृत्व पर पहुंचा दिया और हिडमा को एरिया कमांडर बना दिया गया. साल 2010 में ताड़मेटला में हुए हमले में CRPF के 76 जवानों की मौत में हिडमा की अहम भूमिका थी.
इसके बाद बहुत चर्चित रहे साल 2013 में हुए झीरम हमले में भी हिडमा की अहम भूमिका थी. इस हमले में कई बड़े कांग्रेसी नेताओं सहित 31 लोगों की मौत हो गई थी.

साल 2017 में बुरकापाल में हुए हमले में भी हिडमा की अहम भूमिका बताई गई थी. इस हमले में 25 CRPF जवान शहीद हो गए थे.

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