
बालोद/दल्ली राजहरा। लौह अयस्क की लाल धूल से ढका छोटा सा कस्बा दल्ली राजहरा अपने भीतर एक ऐसी कहानी समेटे हुए है, जो सिर्फ इतिहास नहीं बल्कि संघर्ष, एकता और सेवा का जीवंत उदाहरण है। यहां स्थित शहीद अस्पताल सिर्फ एक अस्पताल नहीं, बल्कि मजदूरों के खून-पसीने से बना जनआंदोलन का प्रतीक है।
संघर्ष से जन्मी सेवा की मिसाल

इस अस्पताल की नींव 1980 के दशक में उस समय पड़ी, जब खदान मजदूर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे। प्रसिद्ध श्रमिक नेता शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में मजदूरों ने यह संकल्प लिया कि वे अपने और अपने समाज के लिए खुद स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी करेंगे।
यही वह दौर था जब हजारों मजदूरों ने श्रमदान और चंदा जुटाकर इस अस्पताल की हर एक ईंट रखी। इसीलिए कहा जाता है कि यह अस्पताल “मजदूरों द्वारा, मजदूरों के लिए” बनाया गया है।
शहादत की याद में बना ‘शहीद’ अस्पताल
इस अस्पताल का नाम उन 11 खनिकों की शहादत की याद में रखा गया, जो 1977 के ऐतिहासिक श्रमिक आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी में मारे गए थे। 3 जून 1983 को जब इसका उद्घाटन हुआ, तो किसी बड़े नेता ने नहीं बल्कि एक खदान मजदूर और एक किसान ने फीता काटकर इसे जनता को समर्पित किया—यही इसकी असली पहचान है।
आज भी मजदूरों की धड़कन
आज यह अस्पताल करीब 150 बिस्तरों वाला सुसज्जित स्वास्थ्य केंद्र बन चुका है, जहां सामान्य चिकित्सा, सर्जरी, प्रसूति, बाल रोग, दंत चिकित्सा और मनोचिकित्सा जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
सबसे खास बात यह है कि यहां इलाज बेहद सस्ता और सुलभ है, जिससे गरीब, किसान और मजदूर वर्ग को बड़ी राहत मिलती है। यही वजह है कि बालोद, कांकेर, राजनांदगांव, रायपुर ही नहीं बल्कि बस्तर के दूर-दराज क्षेत्रों से भी मरीज यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं।
लोकतंत्र से चलता है अस्पताल
शहीद अस्पताल की एक अनोखी पहचान इसकी आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था है। यहां डॉक्टर, नर्स, सफाईकर्मी और अन्य कर्मचारी मिलकर निर्णय लेते हैं।
वेतन, काम के घंटे, अस्पताल के विकास जैसे विषयों पर बैठकों में चर्चा होती है। कई बार लोग कहते हैं कि “यहां लोकतंत्र थोड़ा ज्यादा है”, लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है।
संघर्ष की कहानियां आज भी जिंदा
इस अस्पताल की दीवारें आज भी उन कहानियों को जीवित रखे हुए हैं, जब 10 हजार मजदूरों ने काम रोककर निर्माण कार्य में योगदान दिया था, या जब बिजली की मांग को लेकर आंदोलन हुआ था।
यहां काम करने वाले बुजुर्ग स्वास्थ्यकर्मी आज भी उस दौर की यादें सुनाते हैं, जब मजदूर सिर्फ अपने पेट के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी लड़ते थे।
“संघर्ष और निर्माण” की जीवंत मिसाल
शंकर गुहा नियोगी का दिया गया सिद्धांत “संघर्ष और निर्माण” आज भी इस अस्पताल की आत्मा है। यहां के लोग मानते हैं—
“हम अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं और समाज के लिए सेवा करते हैं।”
मजदूर दिवस पर संदेश
1 मई, मजदूर दिवस के अवसर पर शहीद अस्पताल हमें यह सिखाता है कि जब समाज एकजुट होता है, तो वह अपने लिए बेहतर व्यवस्था खुद खड़ी कर सकता है।
यह अस्पताल सिर्फ इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक प्रेरणा है—जहां इंसानियत, सेवा और संघर्ष आज भी साथ-साथ चलते हैं।
निष्कर्ष
दल्ली राजहरा का शहीद अस्पताल यह साबित करता है कि
“अगर इरादे मजबूत हों, तो मजदूर भी इतिहास रच सकते हैं।”
आज जब स्वास्थ्य सेवाएं महंगी होती जा रही हैं, तब यह अस्पताल एक मिसाल बनकर खड़ा है—
👉 जहां सबसे सस्ता ही नहीं, बल्कि सबसे मानवीय इलाज मिलता है।
