नाचा के जनक दुलार सिंह मंदराजी की मूर्ति के बगल में ही हुई खुमान साव की प्रतिमा की स्थापना
बालोद। जहां एक ओर पूरा देश पंडित राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मना रहा था तो इसी तारीख को जन्मे लोक संगीतकार, छत्तीसगढ़ी संगीत के भीष्म पितामह माने जाने वाले स्व खुमान लाल साव की जयंती को भी एक शिक्षक दिवस के तौर पर उनके शिष्य कलाकारों ने ग्राम कन्हारपुरी में मनाया। यह वही गांव है जो नाचा के पुरोधा कहे जाने वाले दाऊ दुलार सिंह मंदराजी के ग्राम रवेली से लगा हुआ है। दुलार सिंह मंदराजी जी का बचपन कन्हारपुरी में बीता है। वहां उन्होंने पढ़ाई की है। कन्हारपुरी में मंदराजी की प्रतिमा पहले से स्थापित है। उनके संरक्षण में संगीतज्ञ स्वर्गीय खुमान लाल साव ने भी अपने कला जीवन की शुरुआत की थी। शिक्षक दिवस पर उनके शिष्य कलाकारों ने मंदराजी की मूर्ति के बगल में ही स्वर्गीय खुमान साव की मूर्ति की स्थापना की। एक समय खुमान साव के चंदैनी गोंदा पार्टी में गायक रहे महादेव हिरवानी ने अपने गुरु की याद में शिक्षक दिवस पर उनकी प्रतिमा स्थापित की। जो आज स्वयं उनसे शिक्षा लेकर लोक कला मंच धरोहर राजनांदगांव के नाम से पार्टी का संचालन कर छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति को देश दुनिया में फैला रहे हैं। मुख्य आयोजक महादेव हिरवानी के नेतृत्व में हुए प्रख्यात लोक संगीतकार स्वर्गीय खुमान के प्रतिमा अनावरण समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत मंदराजी मंच गौशाला मैदान कन्हारपुरी में छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से कलाकार जुटे हुए थे। जहां पर स्व खुमान द्वारा रचित गीतों और संगीत को उनकी याद ताजा करते हुए उनके शिष्य गायिका श्रीमती अनुराग ठाकुर, शैलजा ठाकुर और कविता वासनिक ने सुमधुर आवाज में प्रस्तुति दी।

आयोजन के मुख्य अतिथि छुरिया के समाज सेवक सुभाष यादव थे। अध्यक्षता जिला पंचायत सदस्य विप्लव साहू ने की। विशेष अतिथि के रूप में मितान लोक कला मंच कल्याण संघ के राजेश मारू, दुर्ग से अरुण निगम, गीत रचनाकार हर्ष कुमार बिंदु आदि प्रमुख पहुंचे हुए थे। नए और पुराने कलाकारों का संगम इस आयोजन में देखने को मिला। जिन्होंने छत्तीसगढ़ की संस्कृति और चंदैनी गोंदा के जरिए स्वर्गीय खुमान लाल के योगदान और संस्मरण को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी। वहीं छत्तीसगढ़ में बंगाल के रविंद्र संगीत की तर्ज पर खुमान संगीत अकादमी की स्थापना खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के जरिए करने की मांग भी उठी। इस मौके पर बालोद से भी कला प्रेमी और साहित्यकारों की टीम यहां पहुंची थी। जिन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक कला संस्कृति को कन्हारपुरी का दौरा कर करीब से जाना। इस गांव के कण-कण में कला बसती है। कई नामी कलाकार इस क्षेत्र से निकले हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ का नाम देश ही नहीं विदेशों तक पहुंचाया है। इसी के चलते अभिन्न राजनांदगांव जिले को कला संस्कृति की नगरी कहा जाता है। बालोद से पहुंची टीम में धरोहर लोक कला मंच के उद्घोषक शिक्षक तामेश्वर प्रसाद कौशल, पैरी से गायक और साहित्यकार सीताराम श्याम, हास्य कलाकार घेवरचंद यादव, भोलाराम साहू, लोकमंच चिन्हारी सुरेगाँव के संचालक कुमार देशमुख, प्रदीप नाग, पत्रकार दीपक यादव, छत्तीसगढ़ी हास्य कलाकार पप्पू चंद्राकर शामिल थे। स्वर्गीय खुमान ने कई लोक कलाकार पैदा किए। जो पहले चंदैनी गोंदा में काम किए फिर स्वयं की पार्टी बनाकर छत्तीसगढ़ की संस्कृति को आगे बढ़ते रहे। मंदराजी की मूर्ति के बगल में ही खुमान की मूर्ति स्थापित कर गुरु शिष्य की परंपरा को भावी पीढ़ी के लिए संजोए रखने की पहल की गई। तो वहीं खुमान के शिष्य कलाकारों द्वारा किए गए इस पहल की छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से पहुंचे कलाकारों ने सराहना की। इस दौरान हास्य कलाकार हेमलाल कौशल, राजेश वाघमारे, बॉबी कलिहारी, गायक मनोहर यादव, विष्णु कश्यप, गुण्डरदेही ब्लॉक के पेंड्री के जवारा लोक कला मंच के धन्नू साहू आदि ने भी अपनी प्रस्तुति दी। आयोजन में नैना साहू, देवा रामटेके लिखन , शिवराज, रामकुमार, कोमल, भीखू, जलाराम, छन्नू आदि का सहयोग रहा।
जरा जानिए स्वर्गीय खुमान साव के बारे में

छत्तीसगढ़ी संगीत के भीष्मपितामह कहे जाने वाले खुमान साव की 5 सितंबर को जयंती थी। जिन्होंने छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक सांस्कृतिक परंपरा में रचे बसे गीतों और विलुप्त होती लोक धुन को संजोने का काम किया था। खुमान साव ने अपनी जिंदगी में लोक कला को हर परिस्थिति में जीवित रखने के लिए संघर्ष किया। इस कारण छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को बचाने वालों की सूची में उनका नाम सम्मान से लिया जाता है। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लोक संगीतकार खुमान लाल साव सही अर्थों में छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक दूत हैं। उन्होंने अपनी विलक्षण संगीत साधना और मंच पर पांच हजार प्रस्तुतियों के जरिए छत्तीसगढ़ महतारी का यश चारों ओर फैलाया है। साव का जन्म 5 सिंतबर 1929 को डोंगरगांव के पास खुर्सीटिकुल गांव में एक संपन्न मालगुजार परिवार में हुआ । 14 साल की उम्र में उन्होंने नाचा के युग पुरुष मंदराजी दाऊ की रवेली नाचा पार्टी में शामिल होकर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया. फिर राजनांदगांव में आर्केस्ट्रा की शुरूआत की। खुमान एंड पार्टी, सरस्वती संगीत समिति, शारदा संगीत समिति और सरस संगीत समिति का संचालन करते हुए उन्होंने आखिर में राज भारती संगीत समिति तक का सफर तय किया. लेकिन आर्केस्ट्रा पार्टियों में फिल्मी गीत संगीत से वे कतई संतुष्ट नहीं थे. उनके भीतर का संगीतकार उन्हें बार बार मौलिक संगीत रचना के लिए प्रेरित कर रहा था। 1970 में उनकी मुलाकात लोक कला मर्मज्ञ बघेरा के दाऊ रामचंद देखमुख से हुई, जो छत्तीसगढ़ की प्रथम लोक सांस्कृतिक संस्था ‘चंदैनी गोंदा’ के निर्माण की योजना बनाकर योग्य कलाकारों की तलाश में घूम रहे थे। उन्हें एक ऐसे संगीत निर्देशक की तलाश थी, जो छत्तीसगढ़ी आंचलिक गीतों में नई जान डाल सके. साव खुद अपनी मौलिक संगीत रचना की प्रस्तुति के लिए बेचैन थे. दाऊ देशमुख के आग्रह को स्वीकार कर साव ‘चंदैनी गोंदा’ में संगीत निर्देशक के रूप में शामिल हुए। संगीतकार खुमान साव और गीतकार लक्ष्मण मस्तुरिया ने दिन रात मेहनत कर ‘चंदैनी गोंदा’ के रूप में देशमुख के सपने को साकार किया। 9 जून 2019 को 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ ।
नाचा के जनक दुलार सिंह मंदराजी कौन थे?

उनका जन्म ग्राम रवेली में 1 अप्रैल 1911 को एक संपन्न मालगुजार परिवार में हुआ। 1928 में लोक कलाकारों को एकत्रित कर उन्होंने अपने गांव में नाच पार्टी की स्थापना की । 1928 से 1953 तक लगभग 25 वर्ष के कार्यकाल में छत्तीसगढ़ के अनेक मूर्धन्य एवं नामी कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। पार्टी के प्रारंभिक दिनों में खड़े साज का प्रचलन था यानी वादक पूरे कार्यक्रम दौरान मशाल की रोशनी में खड़े होकर ही वादन करते थे। मंदराजी ने इसमें बदलाव करते हुए नाच को वर्तमान स्वरूप दिया। वही प्रस्तुति का समय मध्य रात्रि से प्रातः काल तक बढ़ाया। पूर्व में चिकारा नाच का प्रमुख वाद्य था। दाऊजी ने हारमोनियम का प्रयोग शुरू किया। वही मशाल के स्थान पर पेट्रोमैक्स (यूरोपीय लालटेन) का प्रयोग भी शुरू हुआ था। 1940 से 52 तक का समय उक्त पार्टी का स्वर्ण युग माना जाता है। उन्होंने अपने देशभक्ति गीतों के जरिए अंग्रेजी राज के खिलाफ जन जागरण अभियान चलाने का प्रयास भी किया। बाद में रिंगनी नाच पार्टी के साथ विलय हुआ। फिर दाऊ रामचंद्र देशमुख की सांस्कृतिक संस्था छत्तीसगढ़ देहाती कला विकास मंच में दोनों पार्टी के कलाकार शामिल हो गए। मंदराजी जी की मृत्यु 24 सितंबर 1984 को हुई। 2 लाख रुपए का दाऊ मंदराजी सम्मान शासन द्वारा उनकी याद में दिया जाता है।
