बालोद। उमेश कुमार सेन बजरंग दल जिला संयोजक बालोद ने जिले वासियों को गुरु पूर्णिमा की बधाई देते हुए इसके महत्व को भी बतलाया ताकि आने वाली पीढी भी इसका अनुसरण करते रहे आज के दौर में गुरू शिष्य की परंपरा खत्म होती जा रही है उसे फिर से जीवंत करने की जरूरत है। उमेश सेन ने बताया इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने और सत्य नारायण भगवान की कथा करने का विशेष महत्व होता है। गुरु पूर्णिमा महाभारत के रचियता गुरु वेद व्यासजी के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। गुरु पूर्णिमा आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। गुरु की वाणी का एक-एक शब्द आपकी तमाम संपत्ति पर भारी है इसलिए गुरु के सामने कभी भी दौलत-शोहरत का रौब नहीं दिखाना चाहिए.शास्त्रों में बताया गया है कि गुरु का दर्जा भगवान से भी ऊपर होता है इसलिए गुरु के आसन पर कभी नहीं बैठना चाहिए.


गुरु के आसान पर बैठना ना केवल गुरु के साथ-साथ ईश्वर का भी अपमान है. यह पर्व जीवन में गुरु की महत्ता को समर्पित है. सिख धर्म में भी गुरु को भगवान माना जाता इस कारण गुरु पूर्णिमा सिख धर्म का भी अहम त्यौहार बन चुका है. आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है. भारतवर्ष में कई विद्वान गुरु हुए हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास प्रथम विद्वान थे, जिन्होंने सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के चारों वेदों की व्याख्या की थी. सिख धर्म केवल एक ईश्वर और अपने दस गुरुओं की वाणी को ही जीवन का वास्तविक सत्य मानता है. सिख धर्म की एक प्रचलित कहावत निम्न है:‘गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पांव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए’।।
क्या है मान्यता
कहा जाता है कि आषाढ़ पूर्णिमा को आदि गुरु वेद व्यास का जन्म हुआ था. उनके सम्मान में ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है. मगर गूढ़ अर्थों को देखना चाहिए क्योंकि आषाढ़ मास में आने वाली पूर्णिमा तो पता भी नहीं चलती है. आकाश में बादल घिरे हो सकते हैं और बहुत संभव है कि चंद्रमा के दर्शन तक न हो पाएं.
बिना चंद्रमा के कैसी पूर्णिमा! कभी कल्पना की जा सकती है? चंद्रमा की चंचल किरणों के बिना तो पूर्णिमा का अर्थ ही भला क्या रहेगा. अगर किसी पूर्णिमा का जिक्र होता है तो वह शरद पूर्णिमा का होता है तो फिर शरद की पूर्णिमा को क्यों न श्रेष्ठ माना जाए क्योंकि उस दिन चंद्रमा की पूर्णता मन मोह लेती है. मगर महत्व तो आषाढ़ पूर्णिमा का ही अधिक है क्योंकि इसका विशेष महत्व है.
