(रिपोर्ट: साभार सुप्रीत शर्मा पत्रकार बालोद, तस्वीर: महंत दुर्गेश द्वारा प्राप्त)
बालोद । 22 जनवरी को अयोध्या में श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की तैयारी जोर शोर से चल रही है। देश इसका सहभागी बनने को आतुर है। इस मौके पर हम बालोद जिले के एक ऐसे मंदिर की कहानी सामने लाएं हैं जो की राम जानकी मंदिरों में जिले में सबसे प्राचीन है। इसका इतिहास लगभग ढाई सौ साल पुराना है। बात है अर्जुंदा नगर पंचायत क्षेत्र में स्थित राम जानकी मंदिर की। जो एक जमाने में पहले कृष्ण का मंदिर हुआ करता था। लेकिन बाद में उसे राम जानकी मंदिर के रूप में परिवर्तित किया गया। 22 जनवरी को होने वाले अयोध्या मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को यादगार बनाने के लिए यहां भी विशेष पूजा पाठ और आयोजन की तैयारी चल रही है। तो वही इस मौके पर हमने इस मंदिर के महंत दुर्गेश दास से बातचीत की। जिनसे पता चलता है कि इस मंदिर की महत्ता कैसी है? अपनी तरह का यह राम जानकी मंदिर बालोद जिले में सबसे पुराना और इकलौता है। राम की मूर्ति प्राचीन है। तो ही सीता और लक्ष्मण की मूर्ति को 1955 में स्थापित किया गया। उनकी पुरानी मूर्तियां खंडित हो गई थी। लेकिन राम की मूर्ति आज भी सलामत है। राम, जानकी और लक्ष्मण तीनों की पूजा अर्चना एक साथ इस मंदिर में होती है।
देखिए हमारे प्रतिनिधि के साथ राम जानकी मंदिर अर्जुंदा के महंत दुर्गेश दास से बातचीत के कुछ अंश,,,,
मंदिर की खासियत क्या है जो इसे दूसरों से अलग करती है?
निर्मोही अखाड़े वृंदावन से जुड़ा हुआ मंदिर है। मैं यहां का सातवां महंत हूं। यह पहले राधा कृष्ण मंदिर था। जब विस्तार हुआ तो उसे राम जानकी मंदिर के रूप में विकसित किया गया। बताया जाता है कि इस जगह पर लगभग ढाई सौ साल पहले कुछ साधु लोग आए थे जहां पीपल का पेड़ है, सभी ने वहां पूजा पाठ किया और एक मंदिर बनाया था। बाद में इस मंदिर का विकास किया गया। इसका इतिहास के वास्तविक समय पता नहीं चल पाता। जिस हिसाब से पुराने महंत और बुजुर्ग बताते हैं लगभग ढाई सौ साल पुराना मूर्ति है । राम का मूर्ति सबसे पुरानी है तो वही सीता और लक्ष्मण की प्राचीन मूर्ति खंडित हो गई थी उनके जगह सीता और लक्ष्मण की दूसरी मूर्तियां स्थापित कर पुनः 1955 में राम जानकी मंदिर को विकसित किया गया है।
मूर्ति इतनी प्राचीन है तो क्या पुरातत्व विभाग या शासन का इसमें कुछ हस्तक्षेप है?
नहीं, पुरातत्व विभाग के अधीन में ये मंदिर नहीं है, न ही शासन से इसमें कोई सहयोग मिला है। उल्टा पुराने जमाने में शासन से तो उन्हें काफी नुकसान हुआ है। पहले मंदिर की जमीन काफी क्षेत्र में विस्तृत थी ।लेकिन शासन के नियमों के तहत कई जमीन अधिग्रहित कर ली गई ।किसी जमाने में मंदिर के पास 230 एकड़ जमीन थी। जिस समय तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने लैंड सीलिंग एक्ट लागू किया तो अधिकारियों ने इसका फायदा उठाया और मंदिर की जगह को निशाना बनाएं। इसके चलते यहां जमीन घट गई जबकि नियम यह था कि आगामी आदेश तक मंदिरों पर सीलिंग की कार्रवाई न की जाए। लेकिन तत्कालीन अफसरों ने आदेश का पालन नहीं किया। रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव के मंदिरों में कुछ जगह पर ही सीलिंग एक्ट की कार्रवाई हुई लेकिन अर्जुंदा में ज्यादा प्रभाव पड़ा।
मंदिर में साल भर में क्या-क्या विशेष आयोजन होते हैं?
हमारे यहां रामनवमी, जन्माष्टमी, रथ यात्रा और गोवर्धन पूजा प्रमुख रूप से मनाया जाता है। मंदिर में पहले कृष्ण जी की मूर्ति थी। अब राम जी की मूर्ति है। राधा कृष्ण मंदिर पहले डेढ़ सौ साल था ।उसके बाद इसे राम जानकी मंदिर के रूप में बनाया गया। मंदिर का विस्तार जब हुआ जब बड़े रूप में बनाया गया तो मूर्ति बदली गई है। मंदिर निर्मोही अखाड़ा वृंदावन मथुरा से जुड़ा है। जहां बैठक होती है। हमारे भारत में वैष्णव अखाड़े तीन है। दिगंबर, निर्वाणी और निर्मोही। अर्जुंदा का मंदिर निर्मोही अखाड़ा से जुड़ा हुआ है। वर्तमान में समिति में कुल 6 मेंबर है।दो महंत, दो साधु दो एडवोकेट हैं।
22 जनवरी के आयोजन लेकर क्या योजना है?
22 जनवरी को हमने कुछ आयोजन करने की योजना बनाई है। विचार है बड़ी स्क्रीन पर अयोध्या के आयोजन का प्रसारण देखा जाए। लोगों को भी दिखाएंगे । 21 और 22 दो दिन का आयोजन रखेंगे, इस तरह की प्लानिंग है। लाइव प्रसारण के लिए व्यवस्था बनाया जा रहा है।
मंदिर में महंत व्यवस्था किस तरह से काम करती है?
महंत यानी कोई भी साधु बन सकते हैं। ये वंशानुगत नहीं होती है। जो भी साधु बनते हैं परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। इसमें वंशावली नहीं बल्कि गुरु शिष्य परंपरा चलती है। जब तक उम्र रहती है तब तक कोई महंत के रूप में काम कर सकता है। मैं 2007 से महंत का पद संभाल रहा हूं। अगर मैं किसी को शिष्य नहीं बना पाया तो साधु समाज अपने हिसाब से नियुक्त करती है। रोजाना मंदिर में सुबह शाम आरती और भोग होता है।
22 जनवरी अयोध्या में आयोजन को लेकर आपका क्या कहना है?
22 जनवरी को लेकर जो रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है , काफी संघर्ष के बाद यह हो रहा है ।14 साल नहीं बल्कि 500 साल का वनवास काटकर श्री राम पुनः आ रहे हैं। इस मौके पर सभी सनातियों को इकट्ठा होना चाहिए। खुशी मनानी चाहिए। एक हमारे लिए नई दीपावली की शुरुआत हो रही है। सनातन परंपरा में एक दीपावली में लक्ष्मी जी की पूजा होती है इस दीपावली में श्री राम की पूजा करेंगे। हमारे राम जानकी मंदिर में भी भगवान राम की मूर्ति पुरातन है। सीता और लक्ष्मण की मूर्ति को 1955 में नया प्राण प्रतिष्ठित किया गया है। क्योंकि दोनों की पुरानी मूर्ति खंडित हो गई थी जबकि राम जी की मूर्ति लगभग ढाई सौ साल पुरानी है। आज भी सही सलामत है।
मंदिर में आय का जरिया क्या है, भविष्य को लेकर क्या योजना है?
वर्तमान में मंदिर पौन एकड़ क्षेत्रफल में है। सहकारी बैंक के पास ही है मंदिर है। मंदिर के और भी जमीन है। आसपास अभी कुछ जमीन है। साथ ही कृषि भूमि भी है। जिससे आय अर्जित होती है। भविष्य को लेकर यह योजनाएं की बात करूं तो अगर मंदिर की आर्थिक स्थिति भविष्य में बेहतर हो जाती है तो हमारी योजना वृद्धाश्रम खोलने की भी है। जहां से बुजुर्गों को भोजन और भजन दोनों से जोड़ना चाहते हैं। ताकि 24 घंटे मंदिर में राम नाम का जाप होता रहे। तो गरीब जोड़ों का विवाह करवाने की भी योजना है। ताकि भक्ति के साथ समाज सेवा की ओर भी कदम बढ़ सके। यह मेरा सपना है। गरीब विद्यार्थियों को रखकर पढ़ाने की योजना है। वर्तमान में आय का जरिया मंदिर को मिली खेती से होती है। स्वयं मैं भी काश्त करता है। पहले तो वह जमीन बंजर थी। धीरे से कृषि करते सुधार आ गया। धीरे-धीरे आय का स्रोत बढ़ रहा है। गौ सेवा भी होती है। मेरे से पहले जो महंत रहे उनके दौर में मंदिर की आर्थिक स्थिति दयनीय थी। अब काफी सुधार आ गया है।
क्या है निर्मोही अखाड़ा
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद से मान्यता प्राप्त 13 अखाड़ों में से एक है निर्मोही अखाड़ा है. 14वीं सदी में वैष्णव संत और कवि रामानंद ने इस अखाड़े की नींव रखी थी. राम की पूजा करने वाले इस अखाड़े के बारे में माना जाता है कि वो आर्थिक रूप से काफी संपन्न है. इसके यूपी, उत्तराखंड, मप्र, राजस्थान, गुजरात और बिहार में कई अखाड़े और मंदिर हैं. अखाड़े में किशोरवय की शुरुआत में ही बच्चे शामिल कर लिए जाते हैं लेकिन इस दौरान उन्हें पूजा-पाठ और ब्रह्मचारी जीवन की कड़ी सीख दी जाती है. शिक्षा पूरी करने के बाद इन्हें साधु पुकारा जाता है.वैसे पहले निर्मोही अखाड़ा पूजा-पाठ के अलावा लोगों की रक्षा का भी काम करता था. पुराने समय में इसके सदस्यों के लिए वेद, मंत्र आदि समझने के साथ शारीरिक कसरत और अस्त्र-शस्त्र सीखना भी जरूरी था. अखाड़े के संत मानते थे कि रामभक्तों की रक्षा करना उनका धर्म है. यही वजह है कि वे कई तरह के हथियार चलाना सीखते थे, जैसे तलवार, तीर-धनुष और कुश्ती. हालांकि समय के साथ इन चीजों की अनिवार्यता कम हो गई. अब भी निर्मोही अखाड़े के साधुओं के लिए शारीरिक मजबूती जरूरी है लेकिन अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखने की अनिवार्यता नहीं रही. श्री निर्मोही आनी अखाड़ा- इसका मठ धीर समीर मंदिर, बंशीवट, वृन्दावन, मथुरा में स्थित है और इसके संत राजेंद्र दास हैं। अर्जुंदा की राम जानकी मंदिर इसी अखाड़े से जुड़ी हुई है।
