अहं ब्रह्मास्मि : एक रचना ऋचा चंद्राकर “तत्वाकांक्षी” की
अहं ब्रह्मास्मि जगत के ईश्वर उतरे हैं, धरा में राम बनकर।तुम मूर्तियों में खोजते, मनुष्यता को तजकर।। वे अनंत अवतारों में, भिन्न रूप लें — वही हैं।बसे सारे जड़-चेतन में,…
