समता भवन में जैन संत ने श्रद्धालुओं को दी जीवन जीने की कला, कहा—आदत से नहीं, विवेक से करें हर कार्य
बालोद। स्थानीय साधुमार्गी जैन समता भवन में विराजित जैन संत पूज्य अक्षयमुनी जी महाराज साहब ने अपने प्रवचन में श्रद्धालुओं को जीवन जीने की सही कला का संदेश देते हुए कहा कि जीवन में आने वाले दुखों से भयभीत या निराश होने के बजाय उनका सदुपयोग करना सीखना चाहिए। जो व्यक्ति दुखों को अवसर में बदलना सीख लेता है, वही जीवन में वास्तविक सफलता प्राप्त करता है।
पूज्यश्री ने कहा कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सुख और दुख दोनों का आना स्वाभाविक है। दुख के समय घबराना या हार मान लेना किसी समस्या का समाधान नहीं है। इसके बजाय धैर्य, संयम और विवेक के साथ कठिन परिस्थितियों का सामना करना ही सच्ची जीवन साधना है। उन्होंने प्रेरक संदेश देते हुए कहा कि “व्यक्ति को कोई भी कार्य आदत से नहीं, बल्कि विवेक से करना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि आदत से किया गया कार्य व्यक्ति को केवल सुविधा प्रदान कर सकता है, जबकि विवेकपूर्वक किया गया कार्य आत्मसंतोष देता है और उससे किसी अन्य व्यक्ति को पीड़ा पहुंचने की संभावना भी कम होती है। जिस प्रकार शरीर में आत्मा का सर्वोच्च महत्व है, उसी प्रकार जीवन में विवेक का स्थान भी सर्वोपरि है। विवेक के साथ किए गए कार्य व्यक्ति के संस्कारों को समृद्ध करते हैं और उसके व्यक्तित्व को ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं।
पूज्य अक्षयमुनी महाराज ने कहा कि अज्ञानी व्यक्ति दुख आने पर परिस्थितियों से हार मानने लगता है, जबकि ज्ञानी व्यक्ति उन्हीं कठिन परिस्थितियों का साहस और धैर्य के साथ सामना करता है तथा संघर्ष करते हुए आगे बढ़ता है। ज्ञान और अज्ञान तथा आदत और विवेक के बीच के अंतर को जो व्यक्ति समझ लेता है, वह जीवन के प्रत्येक दुख को अपने विकास का माध्यम बना सकता है।
प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। श्रद्धालुओं ने पूज्यश्री के प्रेरणादायी विचारों को ध्यानपूर्वक सुना और जीवन में धैर्य, संयम, विवेक एवं सकारात्मक सोच को अपनाने का संकल्प लिया।












