गणतंत्र दिवस विशेष : जल, जंगल और पहाड़ों के बीच लहराया तिरंगा: गंगरेल डैम की डुबान में भारत माता की आराधना



माधुरी दीपक यादव बालोद। गणतंत्र दिवस के अवसर पर जब पूरा देश संविधान, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता का उत्सव मना रहा था, तब छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के अंतिम छोर पर स्थित एक वनवासी गांव छठियारा (सटियारा) ने राष्ट्रभक्ति की ऐसी अनूठी मिसाल पेश की, जो प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में विरले ही देखने को मिलती है। गंगरेल डैम की अथाह जलराशि के बीच बसे इस गांव में भारत माता और महात्मा गांधी को समर्पित मंदिर परिसर में विशेष रूप से गणतंत्र दिवस मनाया गया—जहां सेवा गीत, तिरंगा परिक्रमा और जल के बीच ध्वजारोहण ने देशप्रेम की अद्भुत तस्वीर रच दी।


डुबान के बीच राष्ट्रभक्ति का तीर्थ

बालोद, धमतरी और कांकेर जिलों की सीमा क्षेत्र में स्थित यह स्थल मूलतः धमतरी जिले में आता है और प्रकृति व इतिहास का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। पहाड़ों से उतरते ही तलहटी में भारत माता का मंदिर और सामने समुद्र-सा फैलता गंगरेल डैम का डुबान क्षेत्र दिखाई देता है। चारों ओर फैली शांति, हरियाली और निस्तब्धता इस स्थान को आत्मचिंतन और साधना का केंद्र बनाती है।


जब देवी होती हैं भारत माता

यहां की परंपरा देशभर से अलग और विलक्षण है। नवरात्र के अवसर पर जहां सामान्यतः देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है, वहीं सटियारा और आसपास के वनवासी अंचल में भारत माता ही आराध्य देवी हैं। चैत्र और शारदीय—दोनों नवरात्र में भारत माता के नाम से मनोकामना ज्योतें प्रज्वलित की जाती हैं। हर वर्ष लगभग 100 से अधिक ज्योतें यहां जलती हैं। समुदाय का विश्वास है कि देश सुरक्षित रहेगा, तो जंगल, जल, जमीन और जीवन—सब सुरक्षित रहेंगे। भारत माता के नाम पर नवरात्र में जोत जलाने की यह परंपरा पूरे भारतवर्ष में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है।


1920 से जुड़ा गांधी जी का ऐतिहासिक अध्याय

मंदिर परिसर में एकाश्म पत्थर से निर्मित महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा वर्ष 1920 में कंडेल नहर सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के धमतरी आगमन से प्रेरित होकर बनवाई गई थी। स्वतंत्रता संग्राम की उस चेतना को ग्रामीणों ने पत्थर में ढालकर आने वाली पीढ़ियों के लिए सहेज दिया।


जहां अखबारों की भी होती है पूजा

इस मंदिर की एक और अनोखी विशेषता है अखबारों की पूजा। अंग्रेजी शासन काल से लेकर आज़ादी तक के कई दुर्लभ समाचार पत्र यहां सुरक्षित हैं। कंडेल नहर सत्याग्रह, गांधी आंदोलनों और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी खबरों का यह संग्रह इस स्थल को चलता-फिरता इतिहास संग्रहालय बनाता है।


हर शुभ कार्य से पहले भारत माता के चरणों में अर्जी

गांव में कोई भी शुभ कार्य—शादी, मुंडन, सामाजिक आयोजन या नया कार्य आरंभ करने से पहले—लोग भारत माता के मंदिर में अर्जी लगाते हैं। चुनाव के समय प्रत्याशी भी यहां पर्चा चढ़ाकर जीत की कामना करते हैं। यह स्थल धार्मिक के साथ-साथ सामाजिक और लोकतांत्रिक आस्था का केंद्र बन चुका है।


सेवा गीत, परिक्रमा और जल के बीच ध्वजारोहण

सोमवार को गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत माता मंदिर समिति के पदाधिकारियों ने भारत माता के सेवा गीत गाए, गंगरेल डैम के पानी के बीच ध्वजारोहण किया और तिरंगा लेकर मंदिर परिसर की परिक्रमा की। इस विशेष आयोजन में अध्यक्ष शिवराम साहू, सह सचिव कामता राम साहू, संरक्षक खिलावन, सुरेश बाबा, सलाहकार हेमराज साहू, कोषाध्यक्ष बबला देवांगन, तुलसी नाग, बंदू राम, दामिनी साहू सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।


इस तरह हुई थी भारत माता और गांधी मंदिर की शुरुआत

मंदिर समिति के अध्यक्ष शिवराम साहू ने बताया कि वर्ष 1920 में कंडेल नहर सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के धमतरी आगमन से दुखुराम और उनकी पत्नी दुखिया बाई अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने वनवासी क्षेत्र में लोगों को देशभक्ति और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए जागृत करने हेतु भारत माता और महात्मा गांधी की तस्वीरों से पूजा-पाठ शुरू किया। यह स्थान स्वतंत्रता सेनानियों का संगम स्थल भी बन गया।

शुरुआत में यह पूजा उनके घर में होती थी। बाद में दुखुराम-दुखिया के पुत्र धन्नू ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्तमान में दुखुराम, दुखिया और धन्नू—तीनों का निधन हो चुका है, जबकि धन्नू की पत्नी लक्ष्मी जीवित हैं। वर्ष 1979 में ग्रामीणों ने चंदा एकत्र कर गंगरेल डैम के किनारे मंदिर निर्माण प्रारंभ किया।


हजार से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़ा है यह स्थल

इस स्थल से लगभग 1000 से अधिक स्वतंत्रता सेनानी और देशप्रेमी जुड़े रहे हैं। बालोद, धमतरी, कांकेर, दंतेवाड़ा, राजनांदगांव, महासमुंद और गरियाबंद जिलों तक के लोग विभिन्न अवसरों पर यहां पहुंचते रहे हैं।


पर्यटन की अपार संभावनाएं, पहचान अब भी अधूरी

इतिहास, राष्ट्रभक्ति और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर यह स्थल देशभक्ति पर्यटन और आध्यात्मिक पर्यटन की अपार संभावनाएं समेटे हुए है। इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के प्रयास कई बार हुए। धमतरी के तत्कालीन कलेक्टर बंसल ने भी पहल की थी, लेकिन तबादले के कारण प्रयास अधूरा रह गया। स्थानीय विधायक ओंकार साहू भी स्थल का भ्रमण कर चुके हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि यदि शासन का ध्यान मिला, तो यह स्थान छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिला सकता है।


100 वर्षों बाद भी जल रही है राष्ट्रप्रेम की ज्योत

वर्ष 1920 से लेकर आज तक, लगभग 100 वर्षों बाद भी इस स्थल की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर यहां मनाया गया आयोजन यह संदेश देता है कि राष्ट्रभक्ति केवल भाषणों में नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और आचरण में जीवित रहती है।

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