🌸ऋतुराज बसंत🌸
ऋतुओं का राजा बसंत, आया है फिर ऐसे।
सरसों गेहूं की बालियां, लहलहाते हो जैसे।।
चहुँ दिशा में बिखरी है स्वर्णिम आभा ऐसे ।
प्रकृति का हर कण- कण चमके, दमके खुशी से जैसे।।
कल- कल करती नदियाँ बहती, चरण पखारे ऐसे ।
आच्छादित पर्वतमालाएं हरी चुनर ओढ़े जैसे।।
नीले अंबर के तले ,मौसम लगे सुहाना ऐसे ।
सब कुछ नया – नया सा लगता ,प्रकृति का बहू रूप हो जैसे।
तितलियों का मंडराना और बेरो का लद जाना ऐसे ।
नई कोपले रूप – रंग से, पेड़ों का सज जाना जैसे ।
शारदे का करें ध्यान, ऋतु बसंत में ऐसे ।
ज्ञान मिले वरदान मिले , सूर साज मिले हो जैसे ।
ऋतुओं का राजा बसंत आया है फिर ऐसे ।
श्रीमती अर्चना राज चौरसिया
ग्राम कन्नेवाडा़ , बालोद
