अक्षय तृतीया पर हुई जगन्नाथपुर में ठाकुर देव के साथ बरतिया देवता की भी पूजा, कई पीढ़ियों से यहां पेड़ पौधे पूजे जाते हैं, जानिए आखिर क्या है यहां की विशेष प्रथा?



वृक्ष और झाड़ियों का झुंड यहां कहलाता है झुण्डा, धार्मिक स्थल के रूप में किया गया है गांव वालों द्वारा इसे संरक्षित

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बालोद। अक्ती यानी अक्षय तृतीया पर हम बालोद ब्लाक के ग्राम जगन्नाथपुर में ऐसे देव स्थल के बारे में बता रहे हैं जिसकी कहानी दूसरों से जुदा है। यहां के ठाकुर देव स्थल को बरतिया देव के नाम से भी जाना जाता है।

इसके पीछे पीढ़ियों से यह किवदंती प्रचलित है कि एक समय इस गांव से होकर एक बारात जा रही थी

और कुछ अदृश्य शक्तियों के कारण वह पत्थर और पेड़ पौधों में परिवर्तित हो गए।जगन्नाथपुर से सुंदरा मार्ग पर वर्षों से यहां वृक्ष और झाड़ियों का झुंड है। जिसे स्थानीय ग्रामीण झुण्डा के नाम से जानते हैं। इस झुण्डा को ग्रामीणों ने धार्मिक स्थल के रूप में संरक्षित करके रखा है।

कहा जाता है कि प्राचीन समय में जब सभ्यताओं का उदय हो रहा था तो लोग पेड़ पौधों तक की भी पूजा अर्चना करते थे। ऐसा ही कुछ रिवाज यहां वर्षों से चला आ रहा है।

और यही वजह है कि इस झुण्डा के नाम से जाने जाने वाले देव स्थल जिसे कहानियों में बरतिया देव कहा जाता है, की पूजा आज भी जगन्नाथपुर के लोग करते हैं। पंचायत प्रशासन द्वारा इस जगह को सुरक्षित करने का प्रयास भी किया जा रहा है। अक्षय तृतीया पर इसी बरतिया देव परिसर में स्थित ठाकुर देव में किसानों द्वारा विशेष पूजा अर्चना हुई। लोग दोना पत्तल में अपने घरों से धान लेकर यहां पहुंचे और सामूहिक पूजा की गई। छोटे बच्चों को खेल खेल में खेती किसानी का मर्म समझाया गया। साथ ही यहीं पर अन्न कुमारी पत्थर भी एक घड़े में छुपा कर रखे गए हैं। उसकी भी अक्षय तृतीया पर निकालकर पूजा अर्चना की गई। ग्रामीणों का कहना है कि यह अन्न कुमारी पत्थर ही हमारे गांव की सुख समृद्धि की निशानी है। बीच-बीच में यह पत्थर संख्या में बढ़ते जाते हैं। इसे ग्रामीण गांव की समृद्धि की निशानी मानते हैं। अक्षय तृतीया के दिन ही इस घड़े को निकाल कर देखा जाता है। जिसमें अन्न कुमारी पत्थर रखे गए हैं। झुण्डा में अधिकतर अकोल , धन-बोहार आदि के वृक्ष और झाड़ियां लगभग दो एकड़ क्षेत्र में फैले हुए हैं। इसे बरतिया देव क्यों कहा जाता है इसके पीछे क्या कहानी है इसकी हम पुष्टि तो नहीं करते लेकिन लोग अपने दादा परदादा से हमेशा यह सुनते आ रहे हैं कि एक जमाने में यहां से कोई बारात जा रही थी और किसी श्राप वश या युग परिवर्तन के दौरान उक्त बारात पेड़ पौधों और पत्थरों में तब्दील हो गए। ठाकुर देव स्थल के आसपास कई पेटी नुमा पत्थर भी है। जिसे किवदंती के अनुसार बारातियों का सामान समझा जाता है। तो वही यहां पर दो विशाल पीपल के पेड़ भी मिले थे। जिसमें से एक कुछ साल पहले आंधी तूफान के चलते धराशायी हो गया। इन्हीं दो पीपल को दूल्हा दुल्हन की संज्ञा भी दी जाती है और उनकी भी विशेष पूजा होती है। अभी एक विशाल पीपल सुरक्षित है। एक साथ इस तरह झुंड में झाड़ियों को वर्षों से देखते आ रहे लोगों के बीच यह जगह कौतूहल का विषय भी बना रहता है। हालांकि इस कहानी में कितनी सच्चाई है कोई नहीं जानते पर शुरुआत से जो मान्यता , परंपरा और प्रथा चली आई है उसे आज की पीढ़ी भी स्वीकार कर चुकी है। इस जगह को धार्मिक स्थल के रूप में सहेज कर रखा जाता है। यहां पर सूचना बोर्ड लगाकर शराब पीने और बेचने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। पंचायत प्रशासन द्वारा भी कुछ विकास कार्य यहां कराए गए हैं। जिससे यहां सीसी रोड और लाइट की व्यवस्था की गई है।

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