बालोद-छत्तीसगढ़ शासन आवास एवं पर्यावरण विभाग मंत्रालय रायपुर के निर्देशानुसार संपूर्ण छत्तीसगढ़ राज्य में फसल कटाई के पश्चात खेतों में बचे हुए फसल अवशेष को जलाए जाने से तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित किया गया है। जिसके अंतर्गत दो एकड़ से कम भूमि रखने वाले कृषकों को पर्यावरण क्षति पूर्ति हेतु 2500 रूपये, दो एकड़ से पांच एकड़ से कम भूमि रखने वाले कृषकों को पर्यावरण क्षति पूर्ति हेतु 5000 रूपये, पांच एकड़ से अधिक भूमि रखने वाले कृषकों को पर्यावरण क्षति पूर्ति हेतु 15000 रूपये से दण्डित करने का प्रावधान है। कृषि विभाग के उप संचालक ने बताया कि जिले में 1.77 लाख हेक्टेयर में धान की फसल ली जाती है। धान कटाई के पश्चात पैरा खेत में छोड़ या जला दिया जाता है। पैरा जलाने से पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है। उन्होंने जिले के किसानों से फसल कटाई के पश्चात् बचे हुए अपशिष्ट फसल को न जलाकर पैरादान करने की अपील की है। इसके साथ ही उन्होंने धान फसल पैरा प्रबंधन के लाभों के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसान धान के पैरा को ग्राम पंचायतों को दान कर सकते है। इसके साथ ही यूरिया से उपचार कर पशुओं के सुपाच्य एवं पौष्टिक चारे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। धान फसल पैरा को कम्पोष्ट में परिवर्तित होने से जीवांश की मात्रा मृदा में बढ़ जाती है। जिससे मृदा की जलधारण क्षमता तथा लाभदायक सूक्ष्म जीवों सूक्ष्म तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है, जो रासायनिक उर्वरकों के उपयोग क्षमता को बढ़ा देती है। ऐसा करने से कम रासायनिक उर्वरक डालकर अधिक पैदावार ली जा सकती है। फसल कटाई उपरांत खेत में पड़े हुए पैरा, भूसा आदि का फसल अवशेषों के साथ ही गहरी जुताई कर पानी भरने से फसल अवशेष कम्पोष्ट में परिवर्तित हो जाएंगे, जिससे अगली फसल के लिए मुख्य एवं सूक्ष्म तत्व प्राप्त होंगे। फसल कटाई उपरांत खेत में धान फसल पैरा पड़े रहने के बाद भी बिना जलाए बीजों की बोनी हेत जिरो सीड कम फर्टिलाईजर ड्रिल, हैप्पी आदि बोनी यंत्र तथा फसल अवशेष प्रबंधन के यत्रों का उपयोग किये जाने से बीज का प्रतिस्थापन खेत की नमी के साथ-साथ ऊपर बिछे हुए फसल अवशेष नमी संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण एवं बीज के सही अंकुरण के लिए मल्चिेंग के रूप में कार्य करेगा।
