चांद की लुकाछिपी ने सुहागिनों को किया परेशान, बदली के कारण देर से हुए दर्शन, करवा चौथ का व्रत संपन्न



गुरुर। करवा चौथ का व्रत शुक्रवार को उल्लास के साथ महिलाओं ने मनाया। पूरे दिन महिलाओं ने पति की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखा। शाम साढ़े सात बजे से शुभ मुहूर्त में पूजन अर्चन का शुरू हुआ। करवा चौथ की शाम को आसमान में बादल छाए हुए थे। जिससे चांद के दर्शन देर से हुए व्रत रखने वाली गुरूर की सुहागिन केसरी राजपूत ने बताया कि लुकाछिपी के चलते रात 9:38 बजे चांद कुछ मिनट के लिए दिखा और फिर छुप गया। कई इलाकों में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली।

बदली के बीच लुकाछिपी के चलते चांद के छिपने के कारण सुहागिनों को अपना व्रत पूरा करने में कुछ परेशानी भी उठानी पड़ी। थोड़ी देर के लिए सही चांद का छलनी से दीदार कर पतियों की पूजा कर सुहागिनों ने अपना व्रत पूरा किया। पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत तोड़ा गया। इसके साथ ही फिर पूजन अर्चन के बाद सेल्फी लेने व तस्वीर खिंचवाने का दौर भी चलता रहा। ज्ञात हो कि व्रत पर्व को लेकर शुक्रवार को घरों के साथ ही बाजारों में उल्लास का माहौल दिखा। व्रत के दिन भी पूजन सामग्री के साथ ही मिठाई व फल की खूब खरीदारी हुई। दिन ढलने के साथ ही घरों में पूजा की तैयारियां तेज हो गई। व्रत रखने वाली महिलाओं ने पूजन-अर्चन किया। करवा चौथ का पाठ भी किया गया। करीब आठ बजे के बाद महिलाएं छत पर आकर चांद का इंतजार करती रही। चांद निकलने पर महिलाओं ने चलनी में दीपक रखकर पति के साथ चांद का दीदार किया। बाजारों में देर शाम तक चहल पहल रही। घाटों के किनारे व छतों पर लोग शाम से ही चंद्रमा के उगने की प्रतीक्षा करते रहे। छतों पर भी काफी चहल पहल रही। कई जगहों पर संगीत व अन्य कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
इस तरह करवा चौथ का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। सुहागिन महिलाओं ने अपने पति की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के साथ निर्जला व्रत रखा था। बदली के कारण देर रात को चांद का दीदार करने के बाद उन्होंने अपने पतियों के हाथों पानी पीकर व्रत का पारण किया। दिनभर बिना पानी पिए व्रत रखने के बाद, शाम को चौथ माता की पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद महिलाएं चंद्रमा के निकलने का बेसब्री से इंतजार कर रही थीं। सुहागिनों ने छलनी की ओट से पहले चांद और फिर अपने पति का दीदार किया। यह त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है, जिसका सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व है। व्रत के लिए महिलाओं ने पहले से ही पूजन सामग्री, करवा और छलनी आदि की खरीदारी कर ली थी। शुक्रवार की सुबह महिलाओं ने निर्जला व्रत का संकल्प लिया। दिनभर निर्जला रहने के बाद, शाम को उन्होंने सोलह श्रृंगार किया और घरों में स्वादिष्ट पकवान बनाने में जुटी रहीं। इसके बाद वे अपने पति और बच्चों के साथ छतों पर जाकर चंद्रदेव के दर्शन के लिए उत्सुक दिखीं।

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