बालोद। दल्लीराजहरा निषाद समाज भवन में हस्ताक्षर साहित्य समिति द्वारा बसंत उत्सव काव्य गोष्ठी समारोह का आयोजन वरिष्ठ साहित्यकार आचार्य जे आर महिलाँगे की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। मुख्य अतिथि अध्यक्ष संतोष कुमार ठाकुर ‘ सरल ‘ ,गोविंद कुट्टी पाणिकर तथा घनश्याम पारकर थे। आचार्य महिलांगे ने कहा कि बसंत की शुरुआत माघ महीने की शुक्ल पंचमी से हो जाती है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में ‘ ऋतुनाम कुसुमाकर:’ बसंत को अपनी सृष्टि माना। सतत आकर्षक लगने वाला निसर्ग बसंत ऋतु मैं अत्यधिक लुभाने लगने लगता है। अपने अनोखे सौंदर्य के कारण वह मनुष्यों को आकृष्ट करता है। साथ ही सकारात्मक प्रेम को अपने कविता में उकेरा जो इस प्रकार है
सकारात्मक प्रेम की भावना हमेशा शाश्वत रहती है ।
प्रेम दिमाग का विषय नहीं है ,यह हमारे अवचेतन की गहराई से उत्पन्न होता है ।
इसलिए प्रेम शाश्वत होता है।
इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष संतोष कुमार सरल ने अपनी रचना के माध्यम से कहा कि मानव को अपने जीवन के सौंदर्य के लिए प्रकृति के पास जाना चाहिए, प्रकृति में ऐसा जादू है कि वह समस्त वेदनाओं को तत्काल भुला देती है। उनकी रचना इस प्रकार है
आगे है बसंत मनमोहन , मीठ मीठ तहूं हर बोल रे।
पतझड़ संग मा बाहर आथे, तभे ये दुनिया हवए गोल रे।।
हास्य व्यंगकार घनश्याम पारकर ने कवि और प्रकृति के बीच भावुक संवेदनाओं को व्यंग्यात्मक रूप में प्रस्तुत करते हुए बताया कि इंसानो द्वारा प्रकृति का दिन रात सत्यानाश किया जा रहा हैं, और कुदरत चुपचाप रहकर अपना बलिदान करते हुए इंसानों की इच्छाओं को पूरा कर रहा है। उनकी कविता इस प्रकार है
तीन बच्छर ले मय हां खोजत रहेंव रीता,नहीं लिख सकत रहेव बसंत ऊपर कविता।
यहां तो बस कैलेंडर में बसंत दिखही, त बता कवि ह कविता कईसे लिखही
वरिष्ठ कवि शमीम अहमद सिद्दीकी ने बताया कि इस दिन सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का विवाह हुआ था। इसलिए यह सिखों के लिए भी महत्वपूर्ण दिन है। उन्होंने अपनी कविता में बसंत अर्थात आशा व सिद्धि का सुंदर संयोग, कल्पना और वास्तविकता का शुभग समन्वय किया जो इस प्रकार है
दिल का अरमान चुरा गया कोई,
जुबा की मुस्कान चुरा गया कोई ।
जब-जब मुझ पर हुई इश कृपा
मेरा वरदान चुरा गया कोई
मंच का वजन बढ़ाने के लिए राजहरा के वजनदार कवि अमित प्रखर ने अपनी कविता में बसंत को जीवन में यौवन व संयम का समन्वय करने वाला और सौंदर्य संगीत तथा स्नेह का निर्माण करने वाला बताया जो इस प्रकार है
चांद जमीन पर लाने वाली, प्रेम मोहब्बत क्या जानो ।
भाग के छत पर आने वाली ,प्रेम मोहब्बत क्या जानो
तत्पश्चात ऊर्जावान चेतना का कवि तामसिंह पारकर ने अपनी रचना में बसंत का उत्सव को प्रकृति की पूजा का उत्सव कहा, बसंत ऋतु में सदैव सुंदर दिखने वाली प्रकृति 16 कलाओं में दीप्त हो उठती है, यौवन हमारे जीवन का मधुमास है तो बसंत इस सृष्टि का यौवन बताया जो इस प्रकार है
मदमाति मन टेसवा ,पिरित के रंग बसंत ।
गोदे मया के गोदना, तर ज्ञानी अऊ संत ।।
वीर रस के कवि आनंद बोरकर ने अपनी कविता में सृष्टि की सुंदरता और यौवन की रसिकता का सुमेल करते हुए वास्तविक अर्थों में बसंत के सार को समझा गया, जो इस प्रकार है
आ मार फूंक बुझा दे मुझे, तेरे इश्क में जलता हुआ चिराग हूं मैं ।
नहीं तो आ लिपट जा सीने से मेरे, तेरे मंजिल का नया आगाज हूं मैं।।
साहित्यकार अमित कुमार सिन्हा ने अपनी कविता में प्रभु श्रीराम के नाम को औषधि समान बताया, जिसे सच्चे हृदय से जपा जाए तो सभी आधी व्याधि दूर हो जाती है और मन को परम शांति मिलती है। उनकी रचना इस प्रकार है
सबके अपने राम जगत में ,कोई ढूंढता है रोटी में ,कोई है जाता धाम
राम है भक्ति राम है मुक्ति राम तो है हर काम
राम नाम के सुमिरन से मिटता कष्ट तमाम।
वरिष्ठ है रचनाकार जी के पणीकर बसंत ऋतु पर प्रकृति की सुंदरता का वर्णन करते हुए रचना के माध्यम से बताया कि प्रकृति का अपना सौंदर्य है जो स्वस्थ और सुखी जीवन प्रदान करता है। जीवन के हर पहलू में आराम, खुशी, सुंदरता, शांति,शांति जो सुंदर है वह प्रकृति है। उनके प्रेरक रचना इस प्रकार है
सतरंगी सी रंगत तेरी, हर सावन को ललचाए।
फूलों को तू लाली देती, टहनी कलियों की शर्माए।।
कार्यक्रम का संचालन अमित प्रखर ने किया तथा अंत में धन्यवाद ज्ञापन तामसिंह पारकर ने किया।
