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एकला चलो रे..टैगोर जयंती पर विशेष कार्यक्रम

बालोद। नावल टीचर्स क्रियेटिव फाउंडेशन के द्वारा गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जयंती पर विशेष वेबिनार कार्यक्रम एकला चलो रे ..का आयोजन किया गया। भारतीय कला संस्कृति के उन्नायक ने साहित्य ,संगीत एवं चित्रकला की दुनिया में विधा की नयी परंपरा का सृजन किया. कार्यक्रम में आमंत्रित वक्ताओं ने रवींद्रनाथ टैगोर का भारतीय कला में योगदान विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किया. एनटीसीएफ अध्यक्ष अरुण कुमार साहू ने टैगोर के शैक्षिक दृष्टिकोण पर चर्चा करते हुए कहा कि जिस प्रकार एक जलती हुई दीपशिखा ही दूसरे दीपक को प्रज्जवलित कर सकती है। उसी प्रकार एक शिक्षक तब तक विद्यार्थी को ज्ञानवान नहीं बना सकता जब तक कि वह स्वयं ज्ञानार्जन में व्यस्त ना हो.आज हमारे देश के धर्म निरपेक्ष प्रजातंत्र को टैगोर के शिक्षा के क्षेत्र में धर्म का अर्थ चरित्र निर्माण और नैतिकता संबंधी विचारों की आवश्यकता है. कार्यक्रम के प्रारंभ में श्री्मती शशिकला सोनी कोरबा ने सरस्वती वंदना, कुमुदनी शराफ बलौदाबाजार ने राजगीत तथा मुनमुन सिन्हा बालोद ने थीम सांग एकला चलो रे की सुमधुर प्रस्तुति दी. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डा.सत्य सारंगी शांति निकेतन कोलकाता के सेवानिवृत्त प्राध्यापक एवं उड़िया साहित्य में पीएचडी ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि टैगोर जी भारतीय नवजागरण के महानायक हैं. शिक्षा के क्षेत्र में वे क्रांतिकारी परिवर्तन चाहते थे. शिक्षक समझते हैं कि हम मूर्तिकार हैं परंतु बच्चे मिट्टी नहीं हैं वह प्रकृति की एक चेतनशील जीवंत सत्ता है. हमें उनके अंदर प्राणशक्ति जागृत करना है. जब हम घर से बाहर निकलते हैं तो हमारे साथ अंतरिक्ष की समूची दुनियां तारे,आकाश, चांद के रूप में मौजूद रहती है यही हमारे आत्मविकास की समग्रता को जानने का माध्यम है.1913 में टैगोर जी को टेलीग्राम से नोबेल प्राइज की सूचना प्राप्त हुई तो उन्होंने कहा कि शांतिनिकेतन के लिये ईश्वर ने मेरी सहायता कर दी.शांतिनिकेतन उनके जीवन के आदर्श, मूल्य,त्याग, तपस्या का एक ज्वलंत उदाहरण है.शिक्षक के अंदर बच्चों जैसी चपल ऊर्जा एवं जिज्ञासु वृत्ति होना चाहिए. उनके आश्रम में एक छात्र पेड़ पर चढ़कर गुरुदेव के प्रश्नों का उत्तर देता था.यही आनंददायी शिक्षा बच्चों की मौलिक प्रवृत्ति को सुरक्षा प्रदान करती है. उनकी कविताएं हमें अपने आप से मुक्त कर कहीं दूर ले जाती हैं हमारे सामने एक अलौकिक दुनियां का सृजन करती हैं. हमारे राष्ट्र गान के रचयिता ने कल्पना की कि हे मेरे भारतवासियों के भाग्य विधाता मेरे देश की भाषा,नदियों, संस्कृति को नमन करता हूं.
कार्यक्रम के विशेष अतिथि शैलेन्द्र कुमार मिश्रा राज्य सहायक प्रशिक्षण आयुक्त कोरिया ने कहा कि एकला चलो रे उनका आजादी का उद्घोष मंत्र है यदि कोई आपकी पुकार नहीं सुनता तो भी रुकिये नहीं निराश मत हो चलते रहिये… अकेले ही सही अपने लक्ष्य को पाने के लिए गतिशील रहिये.
एनटीसीएफ के सदस्य वक्ताओं में पुष्पा सांडिल्य कोरबा ने हम होंगे कामयाब की प्रस्तुति दी.रंजना साहू बालोद ने कहा कि उनके गीतों में प्रकृति, समाज, दुख को पिरोते जाओ तो वह पानी की लहरों की तरह महसूस होगा यही परमपिता का गुणगान है. हिमकल्याणी सिन्हा बेमेतरा ने कहा कि उन्होंने हजारों गीत, कविता,निबंध, नाटक लेखन किया और उनकी कालजयी रचना गीतांजलि हमारी अनमोल धरोहर है. श्रीमती सुचित्रा सामंत सिंग बस्तर ने टैगोर की मार्मिक रचना मेरी रक्षा करो विपत्ति में प्रस्तुत किया. श्रीमती शिल्पी राय बालोद ने बताया कि टैगोर ऐसे विलक्षण साहित्यकार हैं जिनकी रचना तीन देशों में भारत,बांग्लादेश, श्रीलंका के राष्ट्रगान के रुप में सम्मानपूर्वक गाया जाता है. श्रीमती प्रीतिरानी तिवारी रायपुर ने कहा कि यदि देशप्रेम की भावना हो तो उसे किसी भी कार्य से प्रदर्शित किया जा सकता है. श्रीमती हितेश साहू ने कहा कि बच्चों की शिक्षा स्कूल नामक यंत्र से संभव नहीं बल्कि गुरु की संगति से ही चेतना का विकास हो सकता है.आरिफ़ खान दुर्ग ने गीत,श्रीमती बी.यदु नगरी, जलवाती साहू बेमेतरा, माधवी दुर्ग ने अपने विचार व्यक्त किये. कार्यक्रम का संचालन कैशरीन बेग एवं धन्यवाद ज्ञापन लिली पुष्पा एक्का ने किया.

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