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उपलब्धि : पढ़ई तुंहर दुआर के “हमारे नायक” के लिए चयनित हुए खिलौने वाले गुरूजी नंदकुमार सिंह

सूरजपुर । राज्य शासन की मंशा अनुरूप पढ़ाई तुंहर दुआर कार्यक्रम अंतर्गत विभिन्न प्रकार के नवाचार राज्य में किए जा रहे हैं। इस कड़ी में मिस्ड कॉल गुरूजी, ऑनलाइन शिक्षा, लाउडस्पीकर कक्षा, बुलटू के बोल माध्यम से शिक्षा, मोहल्ला कक्षा एवं खिलौना शिक्षा जैसे नवाचार अपनाकर बच्चों को पढ़ाई से सतत रूप से जोड़ने में सफलता प्राप्त हुई है। सूरजपुर जिले में खिलौना से शिक्षा देने का कार्य को बखूबी किया जा रहा है। जिले में खिलौने वाले गुरूजी के नाम से पहचान रखने वाले शिक्षक नंदकुमार सिंह हमारे नायक के रूप में चुने गए और उनकी कहानी छत्तीसगढ़ के पोर्टल पर हमारे नायक कालम में प्रकाशित की गई। इनके कार्यों को हमारे नायक के राज्य ब्लॉग लेखक जिले के शिक्षक गौतम शर्मा ने अपने सुन्दर शब्दों में पिरोया है।

अपने ब्लॉग में उन्होंने उल्लेख किया है कि हमारे जीवन में जितनी मुश्किलें आएंगी उससे सबक लेकर हम जीत को उतना ही बेहतरीन बना पाएंगे। बाल्यावस्था में एक बच्चे के लिए खिलौना, उसका सबसे अच्छा साथी होता है जिससे बच्चे को सबसे ज्यादा लगाव होता है। बच्चा जहां जाता है अपने साथ खिलौने को भी वह लेकर जाता है। अपने साथ प्रतिपल रखता है यहां तक कि उसे अपने साथ सुलाता भी है। खिलौना एक कुशल कारीगर द्वारा शैक्षिक उद्देश्यों के लिए विशेष रूप से निर्मित किया जाता है। बच्चे में सोचने की शक्ति का विकास करने के लिए खिलौना काफी उपयोगी सिद्ध होता है यह बच्चे के व्यक्तित्व और संज्ञानात्मक विकास में महत्वपूर्ण होता है। हम जानते हैं कि खिलौना शिक्षा और प्रशिक्षण के महत्वपूर्ण साधनों में से एक है, उसे संज्ञानात्मक क्षमताओं कल्पनाओं को विकसित करने के लिए साधन के रूप में उपयोग किया जाता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक का कथन भी है कि वयस्कों का मुख्य कार्य एक बच्चे को खिलौना के साथ अभिनय करना सिखाना है। इसके लिए शिक्षक को यह जानने की जरूरत है कि खिलौनों को मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक कार्यों के रूप में कैसे उपयोग किया जाए।

हमारे नायक के रूप में चयनित नंदकुमार सिंह शिक्षक के पद पर शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला दवना, विकासखंड रामानुजनगर में पदस्थ हैं, जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। आप सूरजपुर जिले में खिलौना वाले गुरुजी के रूप में अलग पहचान रखते हैं। आप कई विधाओं में निपुण है जैसे- टेराकोटा विधा, मूर्तिकला, शिल्प कला हो या फिर चित्रकारी हो आप का कोई सानी नहीं है। श्री सिंह ने करोना जैसी विषम परिस्थितियों में अपने मोहल्ला कक्षा में कई प्रकार की विधाओं को सिखाने हेतु प्रशिक्षण का आयोजन किया है जिसमें टेराकोटा विधा प्रमुख रहा है क्योंकि इसमें शून्य लागत लगती है। इनके द्वारा इस करोना काल में मिट्टी, बांस और लकड़ी के शैक्षणिक खिलौनों का निर्माण किया गया है।

मिट्टी के खिलौनों में- जानवर- हाथी, घोड़ा, चूहा, गाय, बाघ, भालू, बंदर, मछली, बकरी व हिरण तो वहीं पक्षियों में कबूतर, मोर, बाज, बत्तख, बगुला, गौरैया, उल्लू, तोता, मैना तो वहीं यातायात के साधनों में- जीप, कार, नाव, हवाई जहाज व बैलगाड़ी, महापुरुषों की मूर्तियों में- महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेंद्र प्रसाद, भीमराव अंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, सरस्वती जी गणेश जी प्रमुख है तो वहीं सब्जियों में- करेला, टमाटर, बैंगन भिंडी, मूली, गाजर, मिर्ची, आलू व खीरा, फ़ल में- जामुन, सेव, अनार, आम, केला, अन्नानास, पपीता व संतरा इत्यादि।

अन्य मिट्टी के खिलौने में- 1 से 100 तक की गिनती को सिखाने हेतु अंक, गुलदस्ते झोपड़ी तो वही लकड़ी से बने खिलौनों में पक्षी, कलश, मछली, बत्तख, तीर- धनुष, घोंसला, नागर, जुवा, पाटा, बैलगाड़ी। बांस के खिलौनों में गणित के चिन्ह, त्रिभुज, घन, घनाभ, बेलन, शंकु, धन, ऋण, गुना, बराबर एवं सजावट की अनेक सामग्रियां का निर्माण आपके द्वारा किया गया है। श्री सिंह ने जिला प्रशासन द्वारा आयोजित कई कार्यक्रमों में बच्चों को टेराकोटा विधा और पेंटिंग विधा का नि:शुल्क प्रशिक्षण प्रदान कर चुके है। आप अपने जिले के शिक्षकों की हर संभव मदद नि:शुल्क करते हैं और आपके द्वारा जिले के कई विद्यालय में जाकर बच्चों को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया जा चुका है। इनके नायक के रूप में चयनित होने से जिले के साथी शिक्षकों में हर्ष व्याप्त है और सभी ने आपके उज्जवल भविष्य की कामना की है।

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