युवावस्था एक चुनौती, हो सभी गंभीर



बालोद । कुछ साल पहले तक कोई वारदात होती थी तो सुनते ही पुलिस वालों की जुबान से यही निकलता कि फलां गैंग ने वारदात की होगी। अब जब वारदात होती है तो खुलासा होने पर पुलिस कर्मियों के साथ-साथ आरोपी व पीड़ित के परिवार वालों के पैरों तले जमीन खिसक जाती है। क्योंकि घटना अंजाम देने वाले पढ़े-लिखे युवा व किशोर होते हैं जो गलत आदतों की वजह से अपराध जगत में कदम रख रहे हैं। इस साल कई मामलों में सामने आया कि स्कूल व कालेज में पढ़ने वाले युवा व किशोरों ने जरायम की इबादत लिखी।

कुमार गौरव साहू, थाना प्रभारी अर्जुन्दा ने कहा कि जिस तरह से किशोर व युवा अपराध की ओर बढ़ रहे है, उसके लिए कहीं न कहीं हमारा बदल रहा समाज व एकल संस्कृति जिम्मेदार है। हम बच्चों की जरूरत तो पूरी कर देते हैं लेकिन उनकी निगरानी नहीं करते। पड़ोसी ने यदि किसी बच्चे की शिकायत करते हुए कुछ बताया तो या तो उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है या फिर पड़ोसी को ही गलत ठहरा दिया जाता है। पहले संयुक्त परिवार होते थे, बच्चों पर किसी न किसी कि निगाह होती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। लड़के टेलीविजन से चिपके रहते हैं। माता-पिता यह नहीं देखते कि बच्चा, अच्छा कार्यक्रम देख रहा या गलत। उसके साथियों और दोस्तों के बारे में भी तहकीकात नहीं की जाती। क्राइम से जुड़े कई कार्यक्रमों का प्रसारण हो रहा है। इनसे वे क्राइम करने के तरीके तो सीखने की कोशिश करते हैं लेकिन अपराध को अंजाम देने वाले अपराधियों का क्या अंजाम होता है, उसे किशोर और युवा नजरअंदाज कर जाते हैं।

डॉ.लीना साहू, संयोजक भारतीय शिक्षण मंडल ने कहा कि बाल मन पतंग के समान होता है, किशोर अवस्था में मन में उमंग अधिक होती है। बच्चे को सही-गलत की समझ कम होती है। उन्हें जो अच्छा लगता है, वहीं वह ठीक समझते हैं। ऐसे में बच्चों की काउंसलिंग करने की जरूरत होती है। उन्हें सही गलत का ज्ञान कराना जरूरी होता है। इसके लिए जरूरी है कि उनके माता-पिता भी उनके लिए समय निकालें। कई बार बच्चे खुद को अकेला पाकर भी गलत रास्ते पर चल देते हैं।

मनोज साहू, अध्यक्ष साहू समाज नवगांव(डू) ने कहा कि काफी हद तक लड़कों में अपराध की भावना पब एवं मोबाइल कल्चर से आ रही है। मोबाइल व टीवी पर फिल्म देखकर वह ऐसी राह चुन लेते है, जो समाज से अलग होती है। वह खुद को हीन मान कर रातो-रात अमीर बनने के सपने देख अपराध की अंधेरी दुनिया की ओर मुड़ जाते हैं। सबसे अधिक उनके मां-बाप जिम्मेदार होते हैं, क्योंकि वह लाडले की शुरुआती गलती को माफ करते रहते है फिर बड़ी गलती पर उन्हें पछतावा होता है।

भेषकुमार साहू, अधिवक्ता, जिला न्यायलय बालोद ने कहा कि जिस तरह से बाल अपराध बढ़ रहे हैं, बाल आरोपी की आयु श्रेणी बदली जानी चाहिए। जब आरोप एक ही है तो आयु का लाभ आरोपी को नहीं मिलने चाहिए। पूर्व में दिल्ली के वसंत विहार में हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद नाबालिग आरोपी को भी समान सजा की मांग उठ चुकी है। जरूरी है कि इस संबंध में गंभीरता से विचार किया जाए और कानून में संशोधन किया जाए।

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