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नवरात्रि विशेष : करहीभदर के इस मंदिर में जलते हैं शीतला, भंगा राव और कारी राव के नाम पर जोत, दंतकथाओं की है विशेष मान्यता, रहस्यमई देवताओं का है यहां वास

बालोद- नवरात्रि के छठवें दिन पर हम बालोद जिले के ग्राम करहीभदर में स्थित विभिन्न देवी देवताओं के सामूहिक मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जिनको वैसे तो मां शीतला धाम के नाम से ही जाना जाता है। यहां पर लोगों में मां शीतला के प्रति ऐसी आस्था है कि हर साल क्वांर नवरात्रि में लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए जोत जलाते हैं। इस बार भी 172 जोत जलाए जा रहे हैं। जिसमें स्थानीय ग्राम वासियों के अलावा दुर्ग, भिलाई, रायपुर तक के श्रद्धालु भी जोत जलाए हुए हैं। यहां का शीतला मंदिर अपने कई रहस्यों और देवी देवताओं की दंत कथाओं के लिए प्रचलित है।

संक्रमण से रक्षा करती है शीतला माता

आपको बता दे कि शीतला मंदिर सामान्यतः हर गांव में मिल जाएगा ।शीतला माता को आमतौर पर पुराने जमाने से चेचक से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। पहले आधुनिक चिकित्सा पद्धति का आविष्कार नहीं हुआ था तो लोग झाड़ फूंक और पूजा पाठ से ही इलाज करते थे। ऐसे में शीतला माता को पूजे जाने के पीछे यही मान्यता चली आ रही है कि यह माता संक्रामक रोगों, खासकर चेचक और अन्य त्वचा संबंधी बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करती है। इस देवी को स्वच्छता का प्रतीक मानकर कई पीढियां पूजा करते आ रहे हैं। शीतला अष्टमी पर बासी और ठंडा भोजन अर्पित करने का भी रिवाज कई जगह देखने को मिलता है। शीतला माता को रोगों की नियंत्रक देवी मानी जाती है। उनकी पूजा चेचक, खसरा और त्वचा संबंधी बीमारियों से बचाव के लिए होता है।

कोई धन तो कोई पशुधन गुम हो जाने पर मांगते हैं मन्नत

शीतला मंदिर समिति के सचिव जितेंद्र साहू ने बताया कि करहीभदर के शीतला मंदिर में लोग अपनी कई इच्छाएं लेकर मन्नत मांगने के लिए आते हैं। खास करके किसी चीज या जानवरों के गुम होने को लेकर ज्यादा मन्नतें मांगते हैं और यहां नारियल फोड़ने, जोत जलवाने पर उनकी गुम हुई चीज मिल भी जाती है। ऐसा कई लोगों के साथ हुआ है। जिससे इस मंदिर को लेकर लोगों में विशेष आस्था बनी हुई है।

पूर्वजों से मान रहे हैं कारी राव महाराज को, जंगल में भटके जानवर मिल जाते हैं

मंदिर समिति और ग्राम विकास समिति के अध्यक्ष पूर्व सरपंच लीला राम डड़सेना ने कहा कि हमारे पूर्वजों से दंतकथा सुनते आ रहे हैं कि पहले आसपास काफी जंगल होते थे। जब लोग अपने बैल, भैंस आदि लेकर जंगल में लकड़ी लेने जाते थे तो उनके जानवर भटक जाते थे और लौट नहीं पाते थे। फिर लोग जय कारी राव नाम से सुमिरन करते थे तो उनके जानवर वापस अपनी जगह पर आ जाते थे। साथ ही जंगल में कई बार जंगली जानवरों से सामना होता था, वहां पर भी जय कारी राव के स्मरण करने के बाद जंगली जानवर बिना किसी को नुकसान पहुंचाए वापस चले जाते थे। इस तरह से प्रचलित कथा के आधार पर आज भी गांव में कारी राव देव स्वरूप में पूजा की जाती है। इसलिए गुम हुए जानवरों को लेकर खास तौर से यहां लोग नारियल फोड़कर मन्नत मांगते हैं। इसके अलावा और भी कई परेशानियों के समाधान हेतु लोग जोत जलाते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर लोग यहां अपने हिसाब से दान करते हैं। उन्होंने कहा कि जब उपचुनाव हुआ तो मैं सरपंच चुनाव जीतने की मनोकामना मांगा था और जीत गया तो मैंने अपनी घोषणा के मुताबिक मां शीतला में एक लाख का दान किया। जिसमें 25000 नगद और 75000 का चांदी का छत्र अर्पित किया।

दंता श्री को मानते हैं यहां पुरुष, मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित, प्रसाद को लेकर भी है कई पाबंदियां

देवताओं के समूह में भीतर एक कक्ष में दंता श्री भी विराजित हैं। जिनकी पूजा अंधेरों में होती है। उनके कमरे में कभी लाइट नहीं जलाया जाता। यह परंपरा कई पीढ़ियों से यहां चली आ रही है। तो वहीं दंता श्री को लोग यहां पुरुष देव मानते हैं। इस कारण उनके कक्ष में महिलाओं का प्रवेश वर्जित किया गया है। उनके यहां विशेष प्रकार से ही प्रसाद नारियल फोड़ कर चढ़ाया जाता है। इस प्रसाद को लेकर भी कुछ पाबंदियां होती है जैसे जिन युवाओं की नई शादी होती है अगर उनकी पत्नी गर्भवती है तो ऐसा युवाओं को प्रसाद नहीं दिया जाता है। प्रसाद देने से पहले यह बातें आवश्यक रूप से यहां पूछी जाती है।

देवताओं के न्यायाधीश माने जाते हैं भंगा राव

मंदिर के अंदर एक कोना भंगा राव देव का भी है। जिसे यहां के ग्रामीण देवी देवताओं के लिए न्यायाधीश मानते हैं। देवताओं के देवपंच के रूप में इनकी पूजा होती है।

माता सेवा का क्रम जारी, आस्था का बना माहौल

जनपद सदस्य लोकेश डड़सेना ने बताया कि करहीभदर के शीतला माता मंदिर में नवरात्रि के महापर्व पर शीतला मंदिर में 172 मनोकामना आस्था के ज्योत जल रहे है। ज्योति कलश की स्थापना बड़े ही भाव भक्ति के साथ की गई है और भव्य ज्योति कक्ष में की गई है जो कि बड़े तालाब में बनी है जो बहुत ही आकर्षक है। मां शीतला माता मंदिर में साल में एक बार मनोकामना ज्योति कलश जलाए जाते हैं और माता जी की आरती के साथ सुबह – शाम माता जी की सेवा गीत गाकर माता को प्रसन्न किया जा रहा है और गांव की सुख समृद्धि के लिए मनोकामना किया जाता है।

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