
बालोद। आज हरेली है। छत्तीसगढ़ के पहली तिहार के रूप में यह हरेली मानी जाती है। इसके बाद त्यौहारों का सिलसिला शुरू हो जाता है। हरेली के दिन गेड़ी का विशेष महत्व है। गेड़ी खास परंपरा है। जिसके बिना हरेली पूरी नहीं होती। हालांकि इस आधुनिकता के दौर में अब गेड़ी लुप्त हो रहे हैं। लेकिन अभी भी कुछ ऐसे गांव हैं जहां के कलाकार इस परंपरा को जीवंत रखे हुए हैं। इसी में एक गांव ऐसा है बालोद जिले का चिलमगोटा। जो कि वनांचल रेंगा डबरी क्षेत्र में है। यहां वर्षों से गेड़ी नृत्य की परंपरा को सहेजने अनूठा प्रयास चल रहा। इस परंपरा को जिन्होंने मजबूती दी वह अब इस दुनिया में नहीं है। वनांचल गेड़ी दल के संचालक शिक्षक सुभाष बेलचंदन जो इसी गांव के स्कूल में पदस्थ थे और उन्होंने छोटे स्कूली बच्चों से इस गेड़ी परंपरा को शुरुआत किया और एक गेड़ी दल का गठन किया, इनकी ख्याति पूरे छत्तीसगढ़ में फैली हुई है। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक में भी इस दल की प्रस्तुति हो चुकी है।

जिसकी वजह से इस गांव को गेड़ी का गांव कहा जाता है। आज उनकी स्मृति में हर कोई भावुक हो रहा है। हरेली में छोटे बच्चे से लेकर बड़े बुजुर्ग भी आज सुभाष बेलचंदन को याद करके आंखें नम कर हैं। क्योंकि उनके बिना ये गांव एक अधूरापन महसूस कर रहा है। हालांकि अब गेड़ी दल के अन्य कलाकार और इस संस्था के प्रमुख जितेंद्र साहू इस परंपरा को आगे संजो रहे हैं और परंपरा कायम रखे हुए हैं। गेड़ी दल के इस विशेष प्रस्तुति को क्रांति सेना के द्वारा बालोद में आयोजित हो रहे जबर हरेली के दौरान भी देखा जा सकेगा। तो वही गांव में भी छोटे से लेकर बड़े गेड़ी का आनंद लेंगे।

संस्कृति को लेकर संरक्षण में वर्षों की जिंदगी लगा दी सुभाष ने

ज्ञात हो कि स्वर्गीय सुभाष बेलचंदन की मौत दो माह पहले कोरोना की वजह से हुई थी। वे संस्कृति को सहेजने में अपना जीवन समर्पित करते थे। पुरानी संस्कृतियो को सहेजने, उनके बारे में जानने और उनकी विधाओं को संरक्षित करने में हमेशा जोर देते शिक्षकीय कार्य के साथ-साथ सांस्कृतिक धरोहर की दिशा में उनका रुझान शुरू से था और इसी के तहत उनकी अलग पहचान हुई थी। उन्होंने गेड़ी को छत्तीसगढ़ में उभारने के लिए एक अहम भूमिका निभाई और इसके लिए उन्हें शासन प्रशासन सहित विभिन्न संस्थाओं से कई अवॉर्ड भी मिले थे। जब यहां के स्कूल में पदस्थ हुए तो कुछ बच्चे कीचड़ में गेड़ी चढ़ने का प्रयास कर रहे थे और गिर रहे थे। यह देखकर उनके मन में आया कि इस परंपरा को आगे अच्छे से संभाल सके इसके लिए बच्चों को तैयार करें। उन्होंने अपने स्कूल के बच्चों से उन्हें गेड़ी में अभ्यास करने की ट्रेनिंग दी और देखते-देखते एक टोली ही तैयार हो गई। बच्चों को देखकर बड़े भी सामने आए और धीरे-धीरे वनांचल गेड़ी दल का गठन हो गया। जो आज परिचय का मोहताज नहीं है। बड़े बड़े आयोजनों में इस गेड़ी दल की प्रस्तुति होती है।
पारागांव में भी परंपरा को सहेजने पहल

तो इधर बालोद के ग्राम पारा गांव में भी गेड़ी की परंपरा को सहेजने के लिए इस बार ग्रामीण अनूठी पहल कर रहे। यहां के ग्रामीण अपने बच्चों को गेड़ी चढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे और स्वयं ग्रामीण मिलजुलकर बच्चों के लिए आकर्षक रंगीन गेड़ी तैयार कर रहें। इन पालकों का विशेष मकसद बच्चों को परंपरा से जोड़े रखना है ताकि इस आधुनिकता के दौर में बच्चे और युवा अपनी परंपरा को ना भूले।
